जहां वकील सीखते थे वकालत का सलीका

Published at :06 Sep 2017 10:33 AM (IST)
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जहां वकील सीखते थे वकालत का सलीका

सासाराम कार्यालय : अयोध्या प्रसाद सिंह ‘कश्यप’, जिनके गुजरे 14 वर्ष हो गये. फिर भी शाहाबाद के चार जिलों के अलावा सीमावर्ती औरंगाबाद व गया जिले की कचहरियों में इस व्यक्ति की खासियत गिनाने वाले कई मिल जायेंगे. एक नामी-गिरामी वकील ही नहीं, सामाजिकता व व्यावहारिकता की प्रयोगशाला के रूप में आज भी वह उदाहरण […]

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सासाराम कार्यालय : अयोध्या प्रसाद सिंह ‘कश्यप’, जिनके गुजरे 14 वर्ष हो गये. फिर भी शाहाबाद के चार जिलों के अलावा सीमावर्ती औरंगाबाद व गया जिले की कचहरियों में इस व्यक्ति की खासियत गिनाने वाले कई मिल जायेंगे. एक नामी-गिरामी वकील ही नहीं, सामाजिकता व व्यावहारिकता की प्रयोगशाला के रूप में आज भी वह उदाहरण माने जाते है.
तभी तो रोहतास व कैमूर जिलों की कचहरियों में आज जिनके वकालत का डंका बज रहा है उनमे से अधिकतर वकील खुद को कश्यप स्कूल ऑफ लर्निंग का प्रोडक्ट बताते हुए गर्व महसूस करते है. यह भी एक संयोग ही है कि 84 वर्ष (5 सितंबर, 1933) कश्यप जी का जन्म सासाराम के करीब बसे सेमरा गांव के एक संपन्न किसान परिवार में हुआ था. वर्ष 1956 में सासाराम कोर्ट में वकालत शुरू की थी और 16 मार्च, 2003 को महज 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया. उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर हर साल सासाराम विधिक संघ भवन में उनके शिष्यों की ओर से बड़े आयोजन की आज भी परंपरा बरकरार है.
यहां के एक जाने-माने वकील ने बताया कि 80 में उन्होंने कश्यप स्कूल ज्वाइन किया था. महज चार वर्षों की वकालत हुई थी. इसी बीच एक मुवक्किल के काम से उन्हें कुदरा थाना के दारोगा के पास जाना पड़ा. तब कैमूर जिला नहीं बना था. सासाराम में ही जिला अदालत था. बेल से जुड़े मामले में केस डायरी में मदद के नाम पर दारोगा को प्रभावित करने के लिए क्लाइंट ने 10 हजार रुपये दिये थे.
दारोगा की इमानदारी से वह परिचित नहीं थे. सो उन्होंने उससे पैसे की पेशकश कर दी. दारोगा ने पैसे नहीं लिए और कहा कि डायरी में उसने सच्चाई लिख दी है. आपके मुवक्किल पर कोई आरोप नहीं है. उसे छूट जाना चाहिए. कहते हैं कि शाम को कश्यप जी के ऑफिस में गया तो दारोगा वाली बात बताते हुए सुझाव दिया कि बेल तो उनका हो ही जायेगा. क्यो न 10 हजार रुपये बचा लिया जाये.
इतना सुनते ही कश्यप जी का पारा चढ़ गया, सहयोगी वकीलों के सामने हमें काफी कुछ सुनना पड़ा. गुरुजी ने यह कहते हुए कि जिस पैसे पर दारोगा का ईमान नहीं डिगा, उस पर वकील का डीग जाये, कितनी शर्म की बात है. इतना ही नहीं, सात दिनों के लिए उनके ऑफिस से उन्हें सस्पेंड किया गया. वह सात दिन उन्होंने कैसे गुजारे, वही जानते है. कश्यप जी की वही कार्रवाई मेरे वकालत का टर्निंग पॉइंट बना. आज मैं शोहरत के शिखर पर हूं. यह कश्यप स्कूल की ही देन है.
आज न वैसे सीनियर है और ना वैसा स्कूल. इस कड़ी में सासाराम के सीनियर वकील राममूर्ति सिंह, रामाशीष सिंह, सैयद शमशाद अली, बसंत कुमार सिंह, मित्रभान सिंह के अलावा भभुआ के आधे दर्जन वरिष्ठ वकील भी उसी स्कूल में सीखा.
1968 में वकील की डिग्री लेकर कचहरी में पैर रखने के पहले मेरे परिवार के मुखिया ने मुझे कश्यप जी के ऑफिस से जुड़ने के लिए भेजा था. उस वक्त भी उनके साथ पांच जूनियर हुआ करते थे. उन्होंने बजाप्ता मेरा इंटरव्यू लिया.
तभी से मैं उनका शिष्य बन गया. उन्होंने मुझे वकालत में चलना, बोलना, उठाना-बैठना सिखाया. लगातार मैं आठ वर्ष उनका जूनियर रहा. सुबह-शाम नियमित उनके ऑफिस में जाता था. आज यद्दपि के यहां मुझे सीनियर वकील का दर्जा प्राप्त है. फिर भी मुझे यह कहते हुए गर्व होता है कि मैं कश्यप स्कूल का छात्र रहा हूं.
त्रिवेणी सिंह, वरिष्ठ वकील, सासाराम
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