700 साल पुराना है माता पूरणदेवी मंदिर का इतिहास, जिसके नाम पर बसा 'पूर्णिया' शहर; यहाँ विराजती हैं दसों महाविद्याएं
Published by : Divyanshu Prashant Updated At : 29 May 2026 8:51 AM
पूरणदेवी मंदिर
Puran Devi Temple: क्या आप जानते हैं कि बिहार के 'पूर्णिया' शहर का नाम कैसे पड़ा? पूर्णिया सिटी में स्थित माता पूरणदेवी का ऐतिहासिक मंदिर न केवल इस शहर की उत्पत्ति का आधार है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र का इकलौता ऐसा सिद्धपीठ है जहाँ तंत्र साधना की दसों महाविद्या देवी की मूर्तियां एक साथ विराजमान हैं.
पूर्णिया से अखिलेश चन्द्रा की रिपोर्ट
Puran Devi Temple: बिहार के गौरवशाली इतिहास और पौराणिक धरोहरों में पूर्णिया सिटी स्थित माता पूरणदेवी मंदिर का एक अत्यंत विशिष्ट और अद्वितीय स्थान है. कभी ‘पूर्ण अरण्य’ (घने जंगलों) की देवी कही जाने वाली माता पूरणदेवी का यह पावन धाम आज असीम आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है. यह पूरे प्रमंडल का एकमात्र ऐसा अनूठा मंदिर है, जहाँ सनातन धर्म की दसों महाविद्याओं (Dash Mahavidya) की देवियों की एक साथ पूजा-अर्चना की जाती है. यही कारण है कि यहाँ केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि तंत्र साधना और मन्नतें लेकर पड़ोसी राज्यों (जैसे पश्चिम बंगाल) और पड़ोसी देश नेपाल से भी सालों भर भारी संख्या में श्रद्धालु और साधक पहुंचते हैं.
दसों महाविद्या की पूजा और मन्नत पूरी होने की अटूट मान्यता
धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पूरणदेवी मंदिर में भक्तों की हर जायज मनोकामना अवश्य पूरी होती है. इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका तांत्रिक और शाक्त महत्व है:
- इकलौता महापीठ: यहाँ मां काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला—इन दसों महाविद्या स्वरूपों की समेकित आराधना होती है, जो अमूमन देश के बहुत कम मंदिरों में देखने को मिलती है.
- संतान प्राप्ति की मान्यता: मंदिर परिसर के ठीक पीछे एक प्राचीन और विशाल तालाब (पोखरा) स्थित है. लोक आस्था के अनुसार, जो भी विवाहित महिला सच्चे मन से इस पवित्र तालाब में स्नान कर माता के चरणों में शीश नवाती है, उसे संतान सुख की प्राप्ति होती है.
700 साल पुराना इतिहास: माता के नाम पर ही पड़ा ‘पूर्णिया’ नाम
ऐतिहासिक धरोहर: इतिहासकारों और स्थानीय जानकारों के मुताबिक, माता पूरणदेवी मंदिर का इतिहास 700 वर्ष से भी अधिक प्राचीन माना जाता है. लोकमान्यता है कि इस पूरे अंचल की अधिष्ठात्री देवी माता पूरणदेवी के नाम के प्रभाव से ही कालक्रम में इस ऐतिहासिक शहर का नाम ‘पूर्णिया’ पड़ा. इस लिहाज से यह मंदिर पूर्णिया की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान की मूल आत्मा है.
सुबह की शुरुआत पूरणदेवी के दर्शन से करते हैं पूर्णियावासी
पूरणदेवी मंदिर के प्रति सीमांचल के लोगों की अगाध और अटूट श्रद्धा है. दिन चाहे सामान्य हो या कोई विशेष त्योहार, पूर्णिया के अधिकांश नागरिक अपने दिन की शुरुआत माता पूरणदेवी के दर्शन और सुबह की मंगल आरती से ही करना पसंद करते हैं.
नवरात्रि, चैती नवरात्र और प्रत्येक मंगलवार व शनिवार को यहाँ भक्तों का ऐसा हुजूम उमड़ता है कि पैर रखने तक की जगह नहीं बचती. मंदिर प्रशासन और स्थानीय श्रद्धालुओं के सहयोग से यहाँ आने वाले दूर-दराज के मेहमानों के लिए पूजन और अनुष्ठान की विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं. यदि आप भी सीमांचल की यात्रा पर हैं, तो पूर्णिया की सांस्कृतिक रीढ़ माने जाने वाले इस भव्य और चमत्कारी धाम का दर्शन करना बिल्कुल न भूलें.
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By Divyanshu Prashant
दिव्यांशु प्रशांत वर्तमान में Prabhat Khabar डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। उन्होंने महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से पत्रकारिता में परास्नातक तथा टी. एन. बी. कॉलेज भागलपुर से हिंदी साहित्य में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। हिंदी साहित्य की पृष्ठभूमि होने के कारण उन्हें पढ़ने, लेखन और कविता-सृजन में विशेष रुचि है। मीडिया क्षेत्र में लगभग एक वर्ष के अनुभव के दौरान वे Dainik Jagran में न्यूज़ राइटर और रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। करियर के शुरुआती दौर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों से जुड़े पॉलिटिकल कंटेंट राइटिंग का विशेष अनुभव प्राप्त किया। सटीक, निष्पक्ष और प्रभावशाली लेखन के माध्यम से पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुँचाना उनकी पेशेवर पहचान है।
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