आज का दर्शन: श्रद्धा और आस्था का दिव्य केंद्र है पूर्णिया का मां कामाख्या स्थान

Edited by Shruti Kumari
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मां कामाख्या मन्दिर पूर्णिया

Maa Kamakhya Temple Purnea: करीब 300 वर्ष पुराने मां कामाख्या मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मंदिर से जुड़ी चमत्कारिक मान्यताएं लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं.

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पूर्णिया के हरदा से छोटे लाल की रिपोर्ट:

Maa Kamakhya Temple Purnea: जिला मुख्यालय से लगभग 13 किलोमीटर दूर के. नगर प्रखंड अंतर्गत मजरा पंचायत स्थित मां कामाख्या स्थान श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र है. धार्मिक मान्यताओं और चमत्कारिक कथाओं से जुड़ा यह मंदिर पूर्णिया प्रमंडल ही नहीं, बल्कि बिहार के विभिन्न जिलों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है. मान्यता है कि असम के प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर के बाद यह भारत का दूसरा कामाख्या मंदिर है.

मंगलवार को विशेष रूप से होती है मां की आराधना

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मां कामाख्या प्रत्येक मंगलवार को पूर्णिया के इस मंदिर में विराजमान रहती हैं. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इसी कारण असम स्थित कामाख्या मंदिर के कपाट प्रत्येक मंगलवार को बंद रहते हैं. इस दिन यहां विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं.

चर्म रोगों से मुक्ति की है मान्यता

मां कामाख्या स्थान को लेकर भक्तों में गहरी आस्था है. मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करने से कुष्ठ रोग सहित कई चर्म रोगों से मुक्ति मिलती है. मंदिर के पुजारी पंडित गौरी कांत झा बताते हैं कि वर्षों से यहां दूर-दूर से लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं और मां की कृपा से उन्हें राहत एवं सफलता प्राप्त होती है.

उन्होंने बताया कि अनेक श्रद्धालु अपनी समस्याओं और असाध्य रोगों से मुक्ति की कामना लेकर यहां पहुंचे और मां की कृपा से स्वस्थ होकर लौटे हैं. यही कारण है कि इस मंदिर की ख्याति लगातार बढ़ती जा रही है.

पान चढ़ाकर मांगी जाती है मनोकामना

मंदिर की सबसे विशेष परंपरा मनोकामना पान चढ़ाने की है. प्रत्येक मंगलवार को विशेष अनुष्ठान के दौरान श्रद्धालुओं की इच्छाओं को जानने के लिए मां के चरणों में पान अर्पित किया जाता है.

मान्यता के अनुसार यदि मां की कृपा से मनोकामना पूर्ण होने वाली होती है तो पान स्वतः नीचे गिर जाता है. यदि पान नहीं गिरता तो इसे मनोकामना पूरी नहीं होने का संकेत माना जाता है. श्रद्धालु इसे मां की दिव्य कृपा और आशीर्वाद का प्रतीक मानते हैं.

तीन सौ वर्ष पुराना बताया जाता है मंदिर का इतिहास

मंदिर का इतिहास लगभग 300 वर्ष पुराना बताया जाता है. मंदिर के पुजारी पंडित गौरी कांत झा के अनुसार भक्त भागीरथ झा, जो एक सिद्ध तांत्रिक साधक थे, उन्होंने अपनी तपस्या और भक्ति से मां कामाख्या को प्रसन्न किया था.

लोक मान्यता है कि मां कामाख्या उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर असम से पूर्णिया के मजरा गांव आईं और यहीं स्थापित हो गईं. इसके बाद क्षेत्र में शांति और धार्मिक चेतना का प्रसार हुआ. कहा जाता है कि मां ने स्वप्न में लोगों को इस स्थान पर नियमित पूजा-अर्चना करने का संदेश दिया था.

ऐसे पहुंच सकते हैं मां कामाख्या मंदिर

मां कामाख्या मंदिर राष्ट्रीय राजमार्ग-31 स्थित फरियानी चौक से लगभग 5 किलोमीटर पश्चिम दिशा में स्थित है.

  • काझा चौक से लगभग 8 किलोमीटर दक्षिण जाने पर मंदिर पहुंचा जा सकता है.
  • कटिहार सीमा के शिशिया मार्ग से लगभग 5 किलोमीटर उत्तर दिशा में यह स्थल स्थित है.
  • मीरगंज से रंगपुरा होते हुए करीब 10 किलोमीटर पूर्व दिशा में मंदिर परिसर तक पहुंचा जा सकता है.

मंदिर तक पहुंचने वाले सभी प्रमुख मार्ग सुगम और अच्छी स्थिति में हैं, जिससे श्रद्धालुओं को आवागमन में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती.

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