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बाढ़-कटाव का नहीं निकला निदान, शिल्ट-गाद के नीचे दफन हुए किसानों के अरमान

Updated at : 23 Oct 2025 5:10 PM (IST)
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बाढ़-कटाव का नहीं निकला निदान, शिल्ट-गाद के नीचे दफन हुए किसानों के अरमान

शिल्ट-गाद के नीचे दफन हुए किसानों के अरमान

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चुनाव में बन रहा बड़ा मुद्दा

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जिले के दो विधानसभा क्षेत्रों के लोग कई दशकों से झेल रहे बाढ़ व कटाव की पीड़ा

बायसी और अमौर का आम अवाम आश्वासन की बजाय चाहता है अब ठोस व स्थायी निदान

वोट मांगने आए तो जनता के सीधा सवालों से घिरेंगे नेताजी, देना होगा हर सवाल का जवाब

अखिलेश चन्द्रा, पूर्णिया

जिले के दो विधानसभा क्षेत्र क्रमश:अमौर और बायसी का आम अवाम चुनाव में इस बार अपनी समस्याओं के स्थायी समाधान को लेकर संजीदा है. इन दो विधानसभा क्षेत्रों के लोग पिछले कई दशकों से बाढ़ व कटाव की पीड़ा झेल रहे हैं. उन्हें इस बात का मलाल है कि निदान की कभी कोई सार्थक पहल नहीं हुई. अब वे कोरे आश्वासन की बजाय ठोस निदान चाहते हैं. आलम यह है कि कभी बाढ़ और कटाव तो कभी शिल्ट और गाद के कारण किसानों के अरमान दफन होकर रह गये. जो किसान कभी अपने इलाके में बड़े जोतदार कहलाते थे, वे मजदूरी करने को मजबूर हो गये. इस बीच नेता बदल गये, उनकी पार्टी बदल गई और सूबे की सत्ता में भी उलट-पलट हुआ पर समस्या जस की तस पड़ी है.

गौरतलब है कि अलग-अलग पांच नदियों से घिरे बायसी और अमौर विधानसभा क्षेत्र में लाखों लोग हर साल बाढ़ और कटाव की पीड़ा झेलते हैं. किसानों को अमूमन हर साल फसल नुकसान का दर्द झेलना पड़ता है जबकि नदियों के भीषण कटाव के चलतेलोगों को अपना खेत और आशियाना तक गंवाना पड़ा है. बायसी से माहीनगर होते हुए चटानी व चहट और यहां से मालोपाड़ा होते हुए चनकी व खरही तक कनकई नदी अपना कहर बरपाती आ रही है. इसी तरह सूरजापुर से 15 किमी आगे जाने पर न गांव नजर आते हैं न खेत. इलाके के कई बुजुर्गों का कहना है कि यदि गांव कटते हैं तो दूसरा आशियाना बना लेते हैं लेकिन कनकई ने खेतों को बहाकर किसानों को फकीर बना दिया है. एक आकलन के अनुसार अकेले बायसी अनुमंडल में करीब 30 हजार एकड़ खेत नदी में विलीन हो चुके हैं. लोगों का कहना है कि सैलाब आता है और जाते-जाते रेत छोड़ जाता है. यहीवजह है कि चनकी, ताराबाड़ी, चकला, चंद्रगांव, मोहम्मदपुर, किस्मत चरैया, रहमत, हरिपुर आदि गांव के खेत अब खेती के लायक नहीं रह गए. इसी तरह अमौर विधानसभा क्षेत्र में भी बड़ी आबादी अमूमन हर साल बाढ़ और कटाव की त्रासदी झेलती है पर उनके बचाव की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं हो सकी है.

सम्पर्क के दौरान मिले मो. फकरुद्दीन, मो. जकीर और मो. रफीक बताते हैं कि चुनाव के समय हर कोई इसके स्थायी समाधान का भरोसा दिलाता है पर कभी कोई पहल नहीं होती. नतीजतन सैलाब के सीजन में इलाके के छोटे-छोटे बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और मवेशी से लेकर आम जनजीवन सभी परेशान रहता है. सभी सड़क कट जाती है तो कभी नाव के भरोसे जिंदगी चलती है. बायसी से ही साथ चल रहे युवा नसर भाई और जहांगीर कहतेहैं कि लोग भी समझ गये हैं कि किसी से कुछ होने वाला नहीं है पर इस बार चुनाव में सामने आने वाले हर प्रत्याशी को सवालों के दायरे में समेटने का मूड बना हुआ है. युवाओं ने कहा कि सैलाब के सीजन में बचाव के लिए महानंदा बेसिन की योजना थी. उसका क्या हुआ, हमारे नेताजी को भी पता नहीं. मो. सलीम और अलमगीेर कहते हैं कि इस इलाके की जनता ने अलग-अलग दोनों विधानसभा सीटों से विधायक ही नहीं बनाया बल्कि बिहार सरकार को मंत्री भी दिया पर मौजूदा हालात बार-बार यह अहसास दिला रहा है कि बायसी अमौर की नियति है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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AKHILESH CHANDRA

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