ePaper

असीम आस्था का केन्द्र है भट्ठा काली मंदिर, पूरी होती हैं मन्नतें

Updated at : 14 Oct 2025 5:47 PM (IST)
विज्ञापन
असीम आस्था का केन्द्र है भट्ठा काली मंदिर, पूरी होती हैं मन्नतें

पूर्णिया

विज्ञापन

पूर्णिया. शहर के प्रमुख स्थान भट्ठा बाजार क्षेत्र में स्थित भट्ठा काली मंदिर, सिर्फ पूर्णिया ही नहीं बल्कि दूर दराज के श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केंद्र है. इस स्थायी काली मंदिर में प्रतिदिन सैकड़ों लोग मां काली की पूजा अर्चना करने आते हैं. वहीं जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगांठ सहित विभिन्न ख़ास अवसरों पर लोग यहां आकर पूजा अर्चना करते हैं और माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. यह मान्यता है कि मां काली, शरण में आने वाले और सच्चे दिल से मन्नत करनेवाले भक्तों को कभी निराश नहीं करतीं. सभी की मनोकामनाएं यहां पूर्ण होती हैं.

क्या है मंदिर का इतिहास

कमेटी के सदस्य बताते हैं कि भट्ठा कालीबाड़ी का निर्माण वर्ष 1974 में हुआ था. कालीबाड़ी के जमीन दानकर्ता चित्तू दा ने अपनी उक्त जमीन दान देकर कालीमंदिर निर्माण की इच्छा जताई और उस समय के युवा अंजन मुखर्जी, अचिंतो बोस, राजेंद्र नाथ मुखर्जी और विनोद कुमार से संपर्क साधा. चारों युवाओं ने उनके प्रस्ताव पर सहमति जताई और दूसरे दिन से ही इस पर चारों युवाओं की टीम ने कार्य करना प्रारंभ कर दिया. प्रथम पूजा 1975 में मिट्टी की मूर्ति द्वारा और खपरैल के बने मंदिर में आरम्भ की गई. इसके बाद पूर्णिया के वकील विभाकर सिंह से टीम के चारों सदस्यों ने संपर्क साधा और मां काली की पत्थर की मूर्ति स्थापित करने की मंशा जताई जिसमें वकील साहब ने अपनी सहमति जताई और पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया. इसके बाद इस टीम में गौतम दा भी जुड़ गए और लोगों से आर्थिक सहायता प्राप्त कर और सांस्कृतिक कार्यक्रम करके धन जुटाया. इसके बाद विनोद कुमार और गौतम दा ने वाराणसी जाकर मां काली की पत्थर की मूर्ति को पूर्णिया लाया. पत्थर की इस मूर्ति को 1976 में स्थापित किया गया और इसके बाद लोगों द्वारा प्राप्त दान की राशि से कालीमंदिर और शिव मंदिर का भी निर्माण हुआ.

हर वर्ष होता है कार्यक्रमों का आयोजन

भट्ठा काली मंदिर जो आज पूर्णिया वासियों के लिए आस्था का प्रतीक है जहां प्रतिदिन लोग संध्या आरती और प्रत्येक माह में होने वाली अमावस्या में श्रद्धा के साथ भाग लेते हैं. बैंक और अन्य विभागों से सेवानिवृत लोग भी संध्या आरती के समय जुट हो कर मां के आरती में शामिल होते हैं. कालीपूजा के अवसर पर भी बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं और मां काली की पूजा कर मनोकामना करते हैं. यहां कालीपूजा के अवसर पर कई तरह की प्रतियोगिताओं का आयोजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होता रहा है. मंदिर पूजा कमिटी के पूर्व कोषाध्यक्ष और निर्माण काल से जुड़े सक्रिय कार्यकर्ता अचिंतो बोस ने बातचीत में बताया कि सचिव अंजन मुखर्जी और निर्माण काल से जुड़े सक्रिय कार्यकर्ता विनोद कुमार की असामयिक मृत्यु के बाद से पिछले तीन वर्षों से इसका आयोजन नहीं किया जा सका है.

नहीं हो सका है पूजा कमिटी का चुनाव

अचिंतो बोस बताते हैं कि अंजन मुखर्जी के निधन के बाद पूजा कमिटी का चुनाव नहीं हो पाया है जिस कारण मंदिर में प्रतियोगिता और सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हो पाया है. उन्होंने कहा पूर्व अध्यक्ष ताज जी, राजेंद्र मुखर्जी और सक्रिय सदस्य दिनकर स्नेही मंदिर के पूजनोत्सव में सक्रिय भागीदारी निभा रहें हैं. कालीबाड़ी के वर्तमान पुरोहित नव कुमार बनर्जी और उनके दोनों पुत्र चना और बिशु मिलकर मां के प्रतिदिन की पूजा को संपन्न करते हैं. वहीं मंदिर के पुरोहित ने बताया का मंदिर का गेट प्रातः 6 बजे खुल जाता है और रात की अंतिम पूजा आरती के बाद 9 बजे मंदिर के पट को बंद कर दिया जाता है. रात के अंतिम आरती के समय में भी कई भक्तगण उपस्थित रहते हैं. इस मंदिर में सम्पूर्ण बंगला रीति रिवाज से पूजा होती है और निर्माण काल से ही बंगाल के बर्दमान जिले के पुजारी द्वारा पूजा की जा रही है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

विज्ञापन
AKHILESH CHANDRA

लेखक के बारे में

By AKHILESH CHANDRA

AKHILESH CHANDRA is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन