पूर्णिया का मिनी बाबाधाम! यहां विराजमान हैं अद्भुत आपरूपी शिवलिंग, 105 किमी पैदल चलकर जल चढ़ाते हैं कांवरिये
धीमेशवर धाम | Prabhat Khabar Network
बनमनखी के पास स्थित बाबा धीमेश्वर धाम, अपने चमत्कारी पारदर्शी शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ भक्त अपना प्रतिबिंब देख सकते हैं. यह कोसी-सीमांचल, नेपाल और पश्चिम बंगाल तक भक्तों की आस्था का केंद्र है.
बनमनखी से पूरब-उत्तर दिशा में काझी हृदयनगर पंचायत के धीमा ग्राम में स्थित बाबा धीमेश्वर धाम महादेव मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है. मंदिर में स्थापित आपरूपी शिवलिंग को लेकर स्थानीय लोगों में गहरी धार्मिक मान्यता है. कहा जाता है कि इस तरह का शिवलिंग देश में गिने-चुने स्थानों पर ही देखने को मिलता है. इसकी विशेषता यह है कि शिवलिंग पारदर्शी है और इसमें श्रद्धालुओं को अपना प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देता है.
बाबा धीमेश्वर धाम की ख्याति कोसी-सीमांचल से निकलकर नेपाल और पश्चिम बंगाल तक फैली हुई है. सावन के महीने में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है. भक्त बाबा धीमेश्वर को मिनी बाबाधाम मानकर पूजा-अर्चना करते हैं.
पारदर्शी शिवलिंग में दिखता है अपना प्रतिबिंब
मंदिर में मौजूद आपरूपी शिवलिंग को श्रद्धालु बेहद चमत्कारी मानते हैं. इसकी पारदर्शिता सबसे खास विशेषता बतायी जाती है. दर्शन के दौरान शिवलिंग में श्रद्धालुओं को अपना प्रतिबिंब दिखाई देता है. धार्मिक आस्था के अनुसार यहां सच्चे मन से मांगी गयी मनोकामना पूरी होती है. इसी विश्वास के कारण दूर-दराज से लोग बाबा धीमेश्वर के दरबार में पहुंचते हैं.
मनिहारी से 105 किमी की यात्रा कर पहुंचते हैं कांवरिये
सावन की सोमवारी पर बाबा धीमेश्वर धाम में जलाभिषेक की विशेष परंपरा है. हजारों शिवभक्त कटिहार के मनिहारी स्थित उत्तरवाहिनी गंगा से कांवर में पवित्र गंगाजल भरते हैं और करीब 105 किलोमीटर की यात्रा तय कर धीमेश्वर धाम पहुंचते हैं. इसके बाद बाबा का जलाभिषेक किया जाता है.
कांवरियों के जत्थे के पहुंचने के दौरान पूरा मार्ग शिवमय हो जाता है. बोल बम और हर-हर महादेव के जयकारों के साथ भक्त बाबा के दरबार तक पहुंचते हैं. सावन की सोमवारी पर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और जलाभिषेक के कारण माहौल भक्तिमय बना रहता है.
हिरण्यकश्यपु से भी जुड़ी है मंदिर की मान्यता
बाबा धीमेश्वर धाम को लेकर एक प्राचीन धार्मिक मान्यता राजा हिरण्यकश्यपु से भी जुड़ी हुई है. स्थानीय लोगों के अनुसार असुरों के सम्राट हिरण्यकश्यपु भगवान शिव के भक्त थे और यहां प्रतिदिन पूजा-अर्चना किया करते थे. मान्यता है कि हिरण्यकश्यपु के आराध्य देव भगवान महादेव ही थे.
मंदिर से पश्चिम की ओर बनमनखी में हिरण्यकश्यपु के किले के भग्नावशेष भी मौजूद होने की बात कही जाती है. इसी वजह से इस क्षेत्र की धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता और बढ़ जाती है.
जंगल के बीच फूस की झोपड़ी में होती थी पूजा
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में धीमा का यह इलाका घने और निर्जन जंगल से घिरा हुआ था. उस समय आपरूपी शिवलिंग के ऊपर फूस का छप्परनुमा घर बनाकर पूजा-अर्चना की जाती थी. बाद में चम्पानगर स्टेट के राजा की ओर से यहां शिवालय बनाने का प्रयास किया गया.
इसके बाद धीमा गांव के शिवभक्तों ने जनसहयोग से मंदिर का निर्माण कराया. धीरे-धीरे बाबा धीमेश्वर धाम की प्रसिद्धि बढ़ती गयी और यह स्थान क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हो गया.
आज बाबा धीमेश्वर धाम में सालभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन सावन में यहां आस्था का अलग ही रंग देखने को मिलता है. दूर-दराज से आने वाले भक्त बाबा के दर्शन, जलाभिषेक और पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.
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लेखक के बारे में
By अरुण कुमार
अरुण कुमार प्रिंट माध्यम में 32 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत दैनिक हिन्दुस्तान से की. अभी प्रभात खबर के पूर्णिया कार्यालय में कार्यरत हैं. सामाजिक सरोकार, अपराध, शिक्षा, राजनीतिक खबरों में रुचि रखते हैं.
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