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जुड़ शीतल पर्व का मिथिलांचल में विशेष महत्व, इंसान से लेकर पशु-पक्षी व पेड़-पौधों का भी रखा जाता है ख्याल

Updated at : 12 Apr 2023 7:20 PM (IST)
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जुड़ शीतल पर्व का मिथिलांचल में विशेष महत्व, इंसान से लेकर पशु-पक्षी व पेड़-पौधों का भी रखा जाता है ख्याल

मिथिलांचल में आज जुड़ शीतल का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है. इस दिन का महत्व मिथिला में काफी अधिक है. जिसमें इंसान से लेकर पशु पक्षी और पेड़-पौधों का भी ख्याल रखा जाता है. जानिये कैसे अपने आप में अनोखा है ये पर्व...

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लोक परंपराओं व आस्था का महापर्व जुड़ शीतल 15 अप्रैल 2023 को पर्व हर्षोल्लास से मनाया जायेगा. मिथिलावासी सतुआनी के बाद अगले दिन जुड़ शीतल मनाते हैं. मिथिला में इसी दिन से नया साल आरंभ होता है. जुड़ शीतल को प्रकृति पर्व माना गया है. जिसमें इंसान से लेकर पशु पक्षी और पेड़-पौधों का भी ख्याल रखा जाता है. मिथिलांचल में इस पर्व का खास महत्व होता है.

सतुआनी के बाद जुड़ शीतल का महत्व

14 अप्रैल को सतुआनी का पर्व लोगो ने मनाया. जबकि 15 को धुड़खेल व शिकारमारी की रश्म पूरी की जायेगी. जुड़शीतल त्योहार को लेकर घर की महिलाएं एक दिन पूर्व सतुआनी के दिन ही विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाया. इस पर्व में लोगों ने खुशी से एक दूसरे को शर्बत भी पिलाया. जूड़शीतल के दिन स्नान करने के बाद अपने कुल देवी देवता को बासी बरी, चावल, दही, आम की चटनी चढ़ाने का परंपरा निभाया जाता है. सारे दुखों से छूटकारा व परिवार में शीतलता बनाये रखने की ईश्वर से प्रार्थना श्रद्धालुओं ने किया.

जुड़ शीतल के दिन क्या है परंपरा

जुड़ शीतल के दिन घर के बड़े बुजुर्ग अपने से छोटे उम्र के सदस्यों के माथे पर अहले सुबह से ही बासी जल डाल कर उन्हें शीतल रहने का आशीर्वाद देते हैं. इस दिन दिन भर चूल्हा नहीं जलाकर उसे ठंडा रखा जाता है और बासी बने भोजन से चूल्हा का पूजन किया जाता है. जूड़ शीतल पर्व से पूर्व दिन में लोग चने से बने सत्तू कूल देवता को चढाये जाने के बाद परिवार के सभी सदस्य मिलकर सत्तू खाते हैं.

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पेड़-पौधों में जल डालने का कारण

जुड़ शीतल के दिन घर के दरवाजे एवं आंगन में बासी जल का छिड़काव किया जायेगा. पेड़-पौधों में जल डालने से तेज गर्मियों से बचाकर शीतल हवा प्रदान करने की कामना लिये लोग इस दिन लोग जल से पौधे को जुड़ाते हैं.

धुड़खेल की रही है परंपरा

इस दिन मिट्टी कीचड़ शरीर में एक दूसरे को लगाने का खेल करने के रिवाज वर्षों से है. कई जगह कुश्ती खेलने का भी आयोजन होता है. मिट्टी लगाने और कुस्ती की परंपरा लगभग अब देखने को बहुत कम ही मिलता है. लोग शिकारमाही भी करते हैं.

POSTED BY: Thakur Shaktilochan

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