जब फटे कुर्ते में मीटिंग करने पहुंचे बिहार के मुख्यमंत्री, चंद्रशेखर ने चंदा मांगकर सिलवाया नया जोड़ा

Karpoori Thakur: भारत रत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर ऐसे ईमानदार शख्स थे जिनके पास दो बार मुख्यमंत्री रहने के बाद भी न अपना घर था और न तन पर साबुत कुर्ता. 17 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि है. राजनीति में ईमानदारी और सादगी के शिखर पुरुष रहे कर्पूरी जी ने सिखाया कि सत्ता सुख भोगने का नहीं, सेवा का साधन है.
Karpoori Thakur: आज के दौर में जहां छोटे-से पद पर आते ही लोगों की लाइफस्टाइल बदल जाती है, वहां कर्पूरी ठाकुर एक अजूबा लगते हैं. बिहार के दो-दो बार मुख्यमंत्री रहे इस शख्स ने पूरी जिंदगी रिक्शे की सवारी की और किराए के मकान या सरकारी आवास में वक्त गुजारा. कल यानी 17 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि है.
कर्पूरी ठाकुर की सादगी का एक मशहूर किस्सा उनके ऑस्ट्रेलिया दौरे का है. उनके पास विदेश जाने के लिए ढंग का कोट तक नहीं था. उन्होंने एक दोस्त से कोट उधार लिया, लेकिन वह भी फटा हुआ था. वे उसी फटे कोट को पहनकर चले गए. जब युगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टिटो की नजर उनके फटे कोट पर पड़ी, तो वे दंग रह गए और उन्होंने सम्मान में कर्पूरी जी को एक नया कोट तोहफे में दिया.
जब मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कर दिया कुर्ते का चंदा
एक बार कर्पूरी ठाकुर के घर पर बैठक चल रही थी. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर भी वहां मौजूद थे. उन्होंने देखा कि मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के कुर्ते की जेब फटी हुई है. चंद्रशेखर से रहा नहीं गया, उन्होंने अपनी झोली फैलाई और बैठक में मौजूद लोगों से चंदा इकट्ठा करना शुरू कर दिया. उन्होंने पैसे कर्पूरी जी को देते हुए कहा, “इनसे एक नया कुर्ता सिलवा लीजिएगा.” कर्पूरी जी ने पैसे तो ले लिए, लेकिन खुद पर खर्च करने के बजाय उन्हें मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करवा दिया. अपने लिए आये पैसों को भी उन्होंने जनता की भलाई के लिय दान कर दिया.
सियासत के कबीर
कर्पूरी ठाकुर को जेपी और लोहिया का मानस पुत्र कहा जाता है. वे आजीवन समाजवादी रहे और पिछड़ों, दलितों और शोषितों की आवाज बने. उनके बारे में पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने कहा था कि वे कबीर की तरह अपनी चदरिया को बेदाग रखकर चले गए. उनके पास विरासत में छोड़ने के लिए अपने पैतृक गांव में एक पक्का मकान तक नहीं था.
बिहार की ताजा खबरों के लिए क्लिक करें
चुनाव लड़ने के लिए पहला चंदा मां से लेते थे
कर्पूरी ठाकुर हर चुनाव का पहला चंदा अपनी मां से लेते थे. कभी एक आना तो कभी आठ आना. वे धनबल के कट्टर विरोधी थे. 14 साल की उम्र में युवाओं की टोली बनाने वाले कर्पूरी ठाकुर ने लाइब्रेरी आंदोलन चलाया और समाज को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया. 17 फरवरी 1988 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया. उनकी सादगी आज भी हर नेता के लिए प्रेरणा है. कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया.
इसे भी पढ़ें: गया-पटना रोड पर सफर होगा आसान, 100 करोड़ की लागत से बनेगा नया रेल ओवर ब्रिज
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Paritosh Shahi
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए










