पांच-छह वर्षों में बिहार के हॉकी खिलाड़ी भी नेशनल टीम खेलेंगे : श्रीजेश

Updated at : 06 Sep 2024 1:09 AM (IST)
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पांच-छह वर्षों में बिहार के हॉकी खिलाड़ी भी नेशनल टीम खेलेंगे : श्रीजेश

पेरिस ओलिंपिक में कांस्य पदक विजेता भारतीय हॉकी टीम के गोलकीपर पीआर श्रीजेश खेल दिवस के मौके पर आयोजित खेल सम्मान समारोह में शिरकत करने गुरुवार को पटना पहुंचे. बिहार में हाॅकी की स्थिति और भविष्य सहित कई विषयों पर प्रभात खबर से श्रीजेश ने विशेष बातचीत की. उन्हाेंने बताया कि बिहार स्पोर्ट्स का हब बनने जा रहा है़ हॉकी का स्ट्रो टर्फ मैदान बन गया है. आने वाले पांच-छह वर्षों में बिहार के हॉकी खिलाड़ी भी नेशनल टीम में खेलने लगेंगे.

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पटना. पेरिस ओलिंपिक में कांस्य पदक विजेता भारतीय हॉकी टीम के गोलकीपर पीआर श्रीजेश खेल दिवस के मौके पर आयोजित खेल सम्मान समारोह में शिरकत करने गुरुवार को पटना पहुंचे. बिहार में हाॅकी की स्थिति और भविष्य सहित कई विषयों पर प्रभात खबर से श्रीजेश ने विशेष बातचीत की. उन्हाेंने बताया कि बिहार स्पोर्ट्स का हब बनने जा रहा है़ हॉकी का स्ट्रो टर्फ मैदान बन गया है. बिहार के खिलाड़ियों को बेसिक सुविधाएं मिलने लगेगी. बिहार में भी हॉकी की दुनिया में तेजी से बदलाव आएगा. आने वाले पांच-छह वर्षों में बिहार के हॉकी खिलाड़ी भी नेशनल टीम में खेलने लगेंगे. बिहार के खिलाड़ी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी के स्ट्रो टर्फ मैदान पर प्रैक्टिस करेंगे. जिससे उनके खेल में निखार आयेगा. यहां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैच होंगे. जिससे यहां के हॉकी खिलाड़ियों को अंतराष्ट्रीय प्लेयर्स के खेल को नजदीक से देखने और सीखने का मौका मिलेगा. यहां भारत की महिला हॉकी टीम खेलने आयी थी. आगे पुरुष टीम भी आयेगी.

हर टीम के खिलाफ अलग-अलग रणनीति

श्रीजेश ने बताया कि ओलिंपिक सहित अन्य टूर्नामेंट में विपक्षी टीम के अनुसार रणनीति बनायी जाती है़ लीग मैचों में दबाव थोड़ा कम होता है. क्वार्टर फाइनल से रणनीति के अनुसार खेलना पड़ता है क्योंकि इस चरण में हारे तो टूर्नामेंट से बाहर हो जायेंगे़ पेरिस ओलिंपिक के सेमीफाइनल की याद करते हुए श्रीजेश ने बताया कि जर्मनी के खिलाफ भारतीय टीम 3-2 से पिछड़ रही थी. मैच के अंतिम क्षण में हमलोगों ने रणनीति बदलते हुए बिना गोलकीपर के खेले और जीत दर्ज की.

स्वभाविक गेम खेलते हैं

बतौर गोलकीपर श्रीजेश ने बताया कि मैच में मैं स्वभाविक गेम खेलता हूं. सामने वाला खिलाड़ी कैसा है. इस पर ध्यान नहीं देता हूं. पेनाल्टी कॉर्नर और पेनाल्टी स्ट्रोक पर मैं यह देखता हूं कि विपक्षी खिलाड़ी उसका पैर किधर है, स्टीक को किस एंगल से पकड़ा है. उसकी आंखों का मूवमेंट किधर है.

खिलाड़ी को खेल के साथ पढ़ाई भी जरूरी

एक खिलाड़ी को खेल के साथ पढ़ाई भी जरूरी है. यदि खेल में सफल नहीं हुआ, तो पढ़ाई ही काम आएगी. श्रीजेश ने बताया कि टीम के पास कोच, फिजियो थेरेपिस्ट, मनोवैज्ञानिक सहित पूरी टीम रहती है. खिलाड़ियों को इनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है. इसका फायदा यह होता है कि एक खिलाड़ी खेल अलावा खेल के दूसरे क्षेत्रों में भी करियर बना सकता है.

अब जूनियर भारतीय हाॅकी टीम को निखारेंगे

श्रीजेश ने बताया कि हॉकी से संन्यास लेने बाद मुझे जूनियर भारतीय हाॅकी टीम के कोच की जिम्मेदारी मिली है. अपने अनुभव से जूनियर टीम को नयी ऊंचाई पर ले जाने का लक्ष्य रखा हूं. ताकि वे सीनियर टीम में अच्छा प्रदर्शन कर सकें. मौका मिलने पर मैच बिहार के हॉकी खिलाड़ियों की हरसंभव मदद करूंगा.

स्ट्रो टर्फ से हॉकी में आया बड़ा बदलाव

1980 के बाद स्ट्रो टर्फ के आने से हॉकी में बड़ा बदलाव आया. श्रीजेश ने बताया कि शुरुआत में भारत में हॉकी के स्ट्रो टर्फ के मैदान कम थे. जिसका असर हमारी टीम के प्रदर्शन पर पड़ा. जबकि यूरोपियन देशों में भारत से कई गुना ज्यादा टर्फ के मैदान थे. धीरे-धीरे भारत में स्ट्रो टर्फ के मैदान बनने लगे. जिसका परिणाम है कि भारत लगातार दो ओलिंपिक में पदक जीता.

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