बिहार में घटी बिजली की खपत, निर्धारित कोटे की 60-70 फीसदी बिजली की ही डिमांड

बिजली की मांग काफी घट जाने पर इकाई को रिजर्व शटडाउन में डालना पड़ता है. फिलहाल बिहार से जुड़ी 107 मेगावाट की फरक्का की दो यूनिट शटडाउन में चल रही है. इसके साथ ही नवीनगर की 660 मेगावाट की एक यूनिट को ओवरहोलिंग के लिए मेंटेनेंस में रखा गया है.
पटना. तापमान में कमी होने के साथ ही सूबे में बिजली की मांग भी घटी है. गर्मियों में 6200 मेगावाट से अधिक की डिमांड वाले बिहार में इन दिनों दिन में अधिकतम 3500 से 3700 मेगावाट, जबकि देर शाम पीक आवर में अधिकतम 4500 से 4800 मेगावाट बिजली की खपत ही हो रही है. ऐसे में बिजली कंपनियां निर्धारित केंद्रीय कोटा 5400-5500 मेगावाट के मुकाबले औसत 60 से 70 फीसदी बिजली ही डिमांड (ड्रॉ) कर रही हैं. शेष कोटे की बिजली नहीं लेने पर उनको एनटीपीसी को फिक्सड कॉस्ट चार्ज का भुगतान करना पड़ता है.
डिमांड नहीं होने पर प्लांट का लोड हो रहा कम
अधिकारियों के मुताबिक केंद्रीय बिजली उत्पादन इकाइयों में कई राज्यों का कोटा होता है. ऐसे में डिमांड नहीं होने पर पावर प्लांट इकाइयों का लोड एक सीमा तक कम किया जा सकता है. बिजली इकाइयों को चलाने के लिए उनकी क्षमता का कम- से -कम 51 फीसदी उत्पादन जरूरी है. ऐसे में मांग काफी घट जाने पर इकाई को रिजर्व शटडाउन में डालना पड़ता है. फिलहाल बिहार से जुड़ी 107 मेगावाट की फरक्का की दो यूनिट शटडाउन में चल रही है. इसके साथ ही नवीनगर की 660 मेगावाट की एक यूनिट को ओवरहोलिंग के लिए मेंटेनेंस में रखा गया है.
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उत्पादन लागत पर फिक्सड कॉस्ट चार्ज निर्भर
उत्पादन लागत के हिसाब से अलग-अलग बिजली उत्पादन इकाइयों से बिजली खरीद की दर अलग-अलग होती है. ऐसे में उनका फिक्सड कॉस्ट चार्ज भी अलग होता है. यह चार्ज उत्पादन इकाई की कुल लागत व बिजली उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले ईंधन के मूल्य आदि के औसत पर निर्भर होता है. चूंकि बिजली बिक्री नहीं होने के बावजूद उनको स्थापना का खर्च उठाना पड़ता है, इसलिए कंपनियों को यह फिक्सड कॉस्ट चार्ज देने की मजबूरी होती है.
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