Bihar News: मुजफ्फरपुर का रहस्यमयी गांव, जहां चमगादड़ को मानते हैं ग्राम देवता

A mysterious village in Muzaffarpur, where bats are considered village deities.
Bihar News: जहां दुनिया चमगादड़ों को अशुभ और बीमारी का वाहक मानने से डरती है, वहीं बिहार के एक गांव में इन्हें देवता का दर्जा दिया जाता है. यहां ग्रामीण मानते हैं कि ये ‘बादुर बाबा’ उनकी ढाल, रक्षक और सुख-समृद्धि के प्रतीक हैं.
Bihar News: मुजफ्फरपुर जिले के मुशहरी प्रखंड का बादुर छपरा गांव इन दिनों अपनी अनूठी आस्था के कारण सुर्खियों में है. इस गांव में हजारों चमगादड़ दूधनाथ महादेव मंदिर के पीछे लगभग 20 एकड़ में फैले श्मशान क्षेत्र में रहते हैं. शाम ढलते ही यह पूरा इलाका जीवित होता है, हजारों चमगादड़ एक साथ उड़ान भरते हैं, मंदिर की परिक्रमा करते हैं और फिर भोजन की तलाश में निकल जाते हैं. ग्रामीण इन्हें साधारण जीव नहीं, बल्कि अपने ग्राम देवता ‘बादुर बाबा’ मानते हैं.
गांव का अनोखा रहस्य
जैसे ही सूर्यास्त होता है, बादुर छपरा गांव की फिजा अचानक बदल जाती है. दुधनाथ महादेव मंदिर के पीछे फैले स्मशान क्षेत्र में शांत बैठे हजारों चमगादड़ एकसाथ पंख फैलाते हैं. काली छाया जैसे आसमान पर तैरने लगती है. बाहर से आने वाले लोग इस दृश्य को देखकर घबरा जाते हैं, लेकिन गांव का हर निवासी इसे शुभ संकेत मानता है. ग्रामीण कन्हैया लाल कहते हैं— ये चमगादड़ नहीं, हमारे रक्षक बादुर बाबा हैं. हमारे गांव पर इनकी कृपा बनी रहती है.
शुभ का प्रतीक हैं ‘बादुर बाबा’
निपाह और कोरोना जैसी वैश्विक बीमारियों के कारण दुनिया भर में चमगादड़ों को अक्सर खतरनाक माना गया. ग्रामीण अवध किशोर सिंह कहते हैं—जहां बादुर रहते हैं, वहां कभी विपत्ति नहीं आती. ये हमारे शुभचिंतक और गांव की रक्षा करने वाली शक्ति हैं.
उनके अनुसार, बड़े-बड़े पेड़ों पर उल्टे लटके चमगादड़ और हवा में एक साथ फैलती पंखों की आवाज किसी अलौकिक आभा का एहसास कराती है.
दूधनाथ मंदिर की कथा
गांव में इस आस्था की जड़ें बहुत गहरी हैं. ग्रामीण बताते हैं कि वर्षों पहले श्मशान के पास स्थित प्राचीन तालाब से एक शिवलिंग प्रकट हुआ था, जिससे दूध की धारा बह रही थी. उसी स्थान पर मंदिर बना—दूधनाथ महादेव मंदिर.
मंदिर के आसपास के पेड़ों पर तब से चमगादड़ों का बसेरा स्थायी हो गया. ग्रामीण इसे संयोग नहीं, बल्कि दिव्य संकेत मानते हैं.
गांव के बुजुर्ग मुक्तेश्वर प्रसाद सिंह एक दिलचस्प दावा करते हैं. चमगादड़ सिर्फ गांव वालों को पहचानते हैं. अगर कोई बाहरी व्यक्ति रात में आसपास घूमे, तो पूरा झुंड शोर मचाने लगता है, मानो चेतावनी दे रहा हो. लेकिन हम गुजरते हैं, तो वे शांत रहते हैं. ग्रामीण इसे ग्राम देवता की “निगरानी” मानते हैं.
हर शुभ काम की शुरुआत इनकी पूजा से
बादुर छपरा में कोई भी शुभ काम शादी, नया घर या त्योहार तभी शुरू होता है जब चमगादड़ों वाले पेड़ों के नीचे दीप चढ़ाया जाता है. गांव में पेड़ों की कटाई पर सख्त रोक है ताकि बादुर बाबा का बसेरा कभी न टूटे.
दुधनाथ मंदिर के पुजारी कमलेश बाबा बताते हैं, जब से बादुर मंदिर के आसपास बसे हैं, गांव में सुख-शांति और समृद्धि बढ़ी है. ये केवल जीव नहीं, गांव के रक्षक हैं.
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लेखक के बारे में
By Pratyush Prashant
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.
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