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बिहार म्यूजियम बिनाले: मुखौटा, नारी शक्ति पर चर्चा

Updated at : 10 Aug 2025 12:52 AM (IST)
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बिहार म्यूजियम बिनाले: मुखौटा, नारी शक्ति पर चर्चा

बिहार म्यूजियम बिनाले 2025 के तहत आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी का शनिवार को समापन हो गया.

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संवाददाता,पटना बिहार म्यूजियम बिनाले 2025 के तहत आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी का शनिवार को समापन हो गया. इसमें कला, संस्कृति और इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई.पहले सत्र में मास्क और मुखौटा पर चर्चा हुई. अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ सार ससाकी ने शमनिक संस्कृति के मुखौटों पर विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि मुखौटे सिर्फ चेहरा छिपाने के लिए नहीं, बल्कि पूर्वजों से संवाद स्थापित करने और भय से मुक्ति पाने का माध्यम भी है. उन्होंने यह भी बताया कि बदलते समय में आदिवासी लोग भी अब तकनीक का उपयोग करने लगे हैं, और राजनीतिक प्रभावों से उनकी सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो रही है.उनके बाद, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष डॉ अचल पांड्या ने भारतीय संस्कृति में मुखौटों के महत्व को रेखांकित किया. अपने देश की संस्कृति और इससे जुड़ी कहानियों को बताया दूसरे सत्र का विषय नारी शक्ति, यौनिकता एवं भौतिक संस्कृति था, जिसमें मेक्सिको के जुआन मैनुएल गरीवे लोपेज, भारत की सीमा कोहली और श्रीलंका के जगत रवीन्द्र ने अपने विचार साझा किया. जुआन लोपेज ने मेक्सिको और भारतीय संस्कृति में स्त्री-ऊर्जा की समानता पर प्रकाश डाला. सीमा कोहली ने द गोल्डन वुम्ब हीरण्यगर्भ कहानी सुनाकर नारी शक्ति के विभिन्न रूपों का विश्लेषण किया और अर्धनारीश्वर को जीवन की पूर्णता का प्रतीक बताया. श्रीलंका के जगत रवीन्द्र ने देवी वल्ली का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे उनकी महिमा ने श्रीलंका को भारतीय आक्रमणों के बावजूद बनाये रखा.अंतिम सत्र विरासत और मिथकीय आख्यानों के आलोक में दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थापत्य की सांस्कृतिक भाषा पर केंद्रित था. इस सत्र में थाईलैंड के डॉ. पोनरट दामरुंग, दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ. पारुल पांड्या धर और इंडोनेशिया के डॉ. अगुस विद्यात्मोको ने व्याख्यान दिया. डॉ. अगुस ने इंडोनेशिया के मौराजांवी साइट की तुलना नालंदा से की और उनके ऐतिहासिक साक्ष्यों में समानता बतायी. डॉ. पारुल पांड्या ने बुद्ध के जीवन पर आधारित टेराकोटा कलाकृतियों और रामायण के विभिन्न देशों में फैलाव पर चर्चा की. डॉ. पोनरट ने दक्षिण-पूर्व एशिया में रामायण के गहरे प्रभाव और इसके शोध महत्व पर प्रकाश डाला. किलाकरी के बच्चों ने दी प्रस्तुति संगोष्ठी के बाद, किलकारी बाल भवन के बच्चों ने भारत के लोकरंग नामक नाट्य प्रस्तुति दी. इस प्रस्तुति में बच्चों ने भारत के विविध राज्यों जैसे केरल, पंजाब, गुजरात, असम और बिहार के लोकनृत्य और गीतों को आकर्षक वेशभूषा में प्रस्तुत किया, जिसने दर्शकों का मन मोह लिया.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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