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Bihar Farmers Income: बिहार के किसानों को बाजार से सिर्फ 20% हिस्सा, 80% मुनाफा बिचौलियों और कंपनियों के पास

Updated at : 31 Aug 2025 7:53 AM (IST)
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बिहार के किसानों को बाजार से सिर्फ 20% हिस्सा, 80% मुनाफा बिचौलियों और कंपनियों के पास

बिहार के किसानों को बाजार से सिर्फ 20% हिस्सा, 80% मुनाफा बिचौलियों और कंपनियों के पास

Bihar Farmers Income: खेत में पसीना बहाने वाले किसान को बाजार से सिर्फ बीस रुपये, जबकि उपभोक्ता की जेब से निकल रहे पूरे सौ रुपये.

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Bihar Farmers Income: बिहार में फल और सब्जी उत्पादन भले ही रिकॉर्ड स्तर पर हो रहा है, लेकिन किसानों की जेब तक उपभोक्ता की दी गई कीमत का केवल 20 फीसदी ही पहुँच रहा है. बाकी 80 फीसदी रकम बिचौलियों, थोक मंडियों और कंपनियों की जेब में जा रही है.

उत्पादन के बाद करीब एक-तिहाई फल और सब्जियाँ खराब हो जाती हैं, क्योंकि राज्य में कोल्ड स्टोरेज, पैक हाउस और प्रसंस्करण की व्यवस्था बेहद कमजोर है. कृषि विभाग की हालिया समीक्षा रिपोर्ट ने इस हकीकत को सामने रखा है.

किसानों के हिस्से सिर्फ 20% कीमत

रिपोर्ट के अनुसार, यदि उपभोक्ता 100 रुपये में फल या सब्जी खरीदता है, तो किसान को उसमें से केवल 20 रुपये ही मिलते हैं. बाकी रकम ट्रांसपोर्टेशन, बिचौलियों, मंडी फीस और खुदरा विक्रेताओं के मुनाफे में बंट जाती है. यही वजह है कि किसान मेहनत के बावजूद आर्थिक संकट से बाहर नहीं निकल पा रहे.

कृषि विभाग की समीक्षा में यह भी सामने आया कि राज्य में उत्पादन के बाद करीब 33% फल और सब्जियाँ बर्बाद हो जाती हैं. कारण है—कोल्ड स्टोरेज और पैकहाउस की भारी कमी. प्रसंस्करण की स्थिति तो और भी खराब है. सिर्फ 2 से 3% फलों और सब्जियों का ही प्रसंस्करण हो पाता है. यही वजह है कि बिहार जैसे बड़े उत्पादक राज्य का योगदान भारत के कुल फलों और सब्जियों के निर्यात में मात्र 0.006% है.

आलू, आम और लीची पर भी बिचौलियों की पकड़

बिहार में आलू, आम और लीची जैसे उत्पादों की खासी पैदावार होती है. राज्य देश के कुल उत्पादन में आलू में 14% और आम में 8% योगदान देता है. लीची का तो 40% उत्पादन यहीं होता है. इसके बावजूद इन उत्पादों का प्रसंस्करण या वैल्यू एडिशन न होने से किसानों को उचित मूल्य नहीं मिलता. बाजार की बड़ी कंपनियाँ इन्हें औने-पौने दाम पर खरीद लेती हैं और ऊँचे दाम पर बेचकर फायदा कमा लेती हैं.

मशरूम और मखाना: उत्पादन में अव्वल, आमदनी में फिसड्डी

बिहार मशरूम उत्पादन में 11% और मखाना उत्पादन में 85% हिस्सेदारी रखता है. मखाने को सुपरफूड माना जाता है और इसकी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी मांग है. बावजूद इसके किसानों की जेब में इसका बड़ा हिस्सा नहीं पहुँच पा रहा. संसाधनों की कमी और बाजार पर कंपनियों के कब्जे की वजह से यह उत्पाद भी किसानों की हालत सुधारने में मददगार नहीं बन पा रहा.

शहद और केला भी घाटे का सौदा

राज्य शहद उत्पादन में देशभर में चौथे और केला उत्पादन में सातवें स्थान पर है. शहद का 12% और केला का 5% से अधिक उत्पादन बिहार से होता है. लेकिन मार्केटिंग चैनल कमजोर होने और स्थानीय ब्रांडिंग न होने के कारण किसानों को सही दाम नहीं मिलते. नतीजा यह कि किसान मेहनत करते हैं, जबकि लाभ बाजार और कंपनियाँ उठा लेती हैं.

सीमांत किसानों पर सबसे बड़ा संकट

बिहार में कुल किसानों में से 91.20% सीमांत किसान हैं, जिनके पास एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है. इनके अलावा 5.80% छोटे किसान (1-2 हेक्टेयर), 2.50% मध्यम किसान (2-4 हेक्टेयर) और सिर्फ 0.20% बड़े किसान (10 हेक्टेयर से अधिक जमीन) हैं. यानी राज्य की कृषि व्यवस्था का अधिकांश भार सीमांत किसानों पर है. इनकी आजीविका पूरी तरह खेती पर निर्भर है. लेकिन उत्पादों के दाम गिरने और बाजार में हिस्सेदारी कम होने की वजह से ये किसान हमेशा आर्थिक संकट से जूझते रहते हैं.

बिचौलियों का शिकंजा

राज्य में कृषि उत्पादों की सप्लाई चेन में बिचौलियों की भूमिका बहुत मजबूत है. किसान सीधे बाजार तक नहीं पहुँच पाते. मजबूरी में उन्हें अपनी उपज थोक बाजार या आढ़तियों को कम दाम पर बेचनी पड़ती है. वहीं, उपभोक्ता तक पहुँचने से पहले वही उपज कई हाथों से गुजरती है और दाम चार से पाँच गुना तक बढ़ जाता है.

इस संकट से निकलने के लिए राज्य में बड़े पैमाने पर कोल्ड स्टोरेज, पैकहाउस, फूड प्रोसेसिंग यूनिट और सीधी मार्केटिंग की व्यवस्था विकसित करनी होगी. किसानों को संगठित करने और सहकारी समितियों के जरिये सीधे बाजार तक पहुँचाने पर जोर देना होगा.
इसके साथ ही राज्य के प्रमुख उत्पादों—मखाना, लीची, मशरूम, आलू और शहद—की ब्रांडिंग और वैल्यू एडिशन से किसानों की आमदनी में बड़ा सुधार हो सकता है.

किसानों की हालत कब सुधरेगी?

जब तक किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम सीधे नहीं मिलेगा, तब तक उनकी हालत में सुधार संभव नहीं है. अभी हालात यह हैं कि किसान मेहनत और लागत झेलते हैं, लेकिन असली मुनाफा बाजार और कंपनियाँ ले जाती हैं.

अगर सरकार प्रसंस्करण उद्योगों को प्रोत्साहन दे और सप्लाई चेन को पारदर्शी बनाए, तभी बिहार का किसान समृद्ध हो पाएगा.

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Pratyush Prashant

लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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