डॉक्टर से कवयित्री बनीं Tishya Shree: कहती हैं- वही काम करना चाहिए, जिसमें हम अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकें

बिहार की बेटी डॉ तिष्या श्री (Tishya Shree) ने एमबीबीएस जैसे सुरक्षित पेशे को छोड़ साहित्य की राह चुनी. मिथिला की सांस्कृतिक विरासत से प्रेरित उनकी कविताओं में प्रेम, शृंगार और भावनाओं की गहराई झलकती है. साहित्य के जरिए समाज को प्रेम का सही अर्थ समझाना उनका उद्देश्य है.
बिहार की बेटी डॉ तिष्या श्री (Tishya Shree) ने अपनी कविताओं और शायरी से साहित्य जगत में खास पहचान बनाई है. उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र जैसे सुरक्षित और सम्मानित पेशे को छोड़कर साहित्य की राह को अपनाया. उनके लेखन में प्रेम, शृंगार और भावनाओं की गहराई दिखती है, जो उनके मिथिला क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से प्रेरित है.
आज उनकी रचनाएं लोगों के दिलों में बस चुकी हैं और वे साहित्य जगत में एक चमकते सितारे के रूप में उभर रही हैं. वह कहती हैं कि हमें वही काम करना चाहिए जिसमें हम अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकते हैं. मेरा मानना है कि यदि आप दिल से कुछ करते हैं, तो वह सफल होता है.
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Q. आपने डॉक्टर के प्रोफेशन को छोड़ साहित्य को चुना. क्या कभी इस फैसले पर डर या दुविधा महसूस हुई?
– हां. एमबीबीएस एक सुरक्षित और सम्मानित पेशा था और साहित्य के क्षेत्र में आना मेरे लिए कोई आसान निर्णय नहीं था. यह फैसला मैंने अपने फाइनल इयर में लिया. क्योंकि, मुझे डॉक्टरी पेशे में नहीं जाना था. साहित्य के क्षेत्र में जाने का फैसला करते वक्त मुझे डर लगा था क्योंकि मैं नहीं जानती थी कि मेरी यह यात्रा किस दिशा में जाएगी. कई रातें मैंने यह सोचकर व्यतीत कीं कि क्या मुझे इस फैसले से सफलता मिलेगी. और फिर मेरी ये सोच ने मुझे अडिग रखा कि जिस क्षेत्र में आप अपना सौ फीसदी दे सकते हैं, आपको वही करना चाहिए.
Q. आपकी रचनाओं में भावनाओं की गहराई दिखती हैं. मिथिला की संस्कृति ने आपकी लेखनी को किस तरह गढ़ा है?
– मुझे गर्व है कि मैं दरभंगा और मिथिला की बेटी हूं. मेरी रचनाओं को आज देशभर में सराहा जा रहा है, तो इसका पूरा श्रेयमिथिलांचल की साहित्यिक धरा को जाता है.मिथिलांचल की माटी में साहित्य की खुशबू है, जो मुझे हमेशा प्रेरित करती रही है. यह वही धरती है जिसने विद्यापति, गार्गी और मंडन मिश्र जैसे महान विद्वानों को जन्म दिया. मेरे लेखन में इसी सांस्कृतिक धरोहर का प्रभाव है. इसे एक पंक्ति से समझते हैं
“छोड़ पेशा मोहब्बत को गाती हूं मैं,
सारे संसार का प्रेम पाती हूं मैं,
मां सिया ने किया धन्य जिस भूमि को,
ऐसी पावन धरा से ही आती हूं मैं.”
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Q. आपकी कविताओं में प्रेम, शृंगार और भावनात्मक सौंदर्य प्रमुख है. आपके लिए ‘प्रेम’ लिखना क्या सिर्फ भावना है या एक सामाजिक जिम्मेदारी भी?
– प्रेम मेरे लिए सिर्फ एक भावना नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक जिम्मेदारी भी है. मैं चाहती हूं कि लोग प्रेम के सही मायने समझें. आजकल प्रेम का अर्थ सिर्फ शारीरिक संबंधों तक सीमित कर दिया गया है, जो बिल्कुल गलत है. प्रेम राष्ट्र से हो सकता है, परिवार से हो सकता है और हर रिश्ते में प्रेम की आवश्यकता होती है. मेरा यह मानना है कि अगर दुनिया प्रेम को सही तरीके से समझे, तो संघर्ष और युद्ध की कोई जरूरत नहीं होगी. मेरी रचनाओं का उद्देश्य यही है कि प्रेम को उसके असली रूप में प्रस्तुत किया जाए और इसे सशक्त रूप से समाज में स्थापित किया जाए.
Q. मंच पर शायरी पढ़ने और किताब में कविता छपने, इन दोनों अनुभवों में आपको सबसे बड़ा अंतर क्या लगता है?
– दोनों का अनुभव अलग होता है. जब आप किताब में लिखते हैं, तो आपको शांति की आवश्यकता होती है, और आप अपने विचारों पर गहरे चिंतन के बाद लिखते हैं. लेकिन मंच पर जाते वक्त, जब आप उन कविताओं को लोगों के बीच पढ़ते हैं, तो वह एक अलग अनुभव होता है. मंच पर पाठ करते वक्त, आप अपनी रचनाओं के माध्यम से सीधे लोगों से जुड़ते हैं और उनकी प्रतिक्रिया प्राप्त करते हैं. यह एक संतुष्टि और खुशी का अहसास दिलाता है.
Q. लेखन या कला के क्षेत्र में करियर बनाने की सोच रही लड़कियों को क्या सलाह देना चाहेंगी?
– पूरी तैयारी के साथ आएं. इस क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार रहना बहुत जरूरी है. चुनौतियां आएंगी, लेकिन अगर आपने ठान लिया है तो कोई भी शक्ति आपको रोक नहीं सकती.
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लेखक के बारे में
By हिमांशु देव
सितंबर 2023 से पटना में प्रभात खबर से जुड़कर प्रिंट और डिजिटल के लिए काम कर रहे हैं. कला, साहित्य-संस्कृति, नगर निगम और स्मार्ट सिटी से जुड़ी खबरों पर प्रमुखता से काम किया है. महिला, युवा और जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाना प्राथमिकता में शामिल है. व्यक्तिगत तौर पर किताबें पढ़ना और नई जगहों को एक्सप्लोर करना अच्छा लगता है.
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