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चंपारण सत्याग्रह के 100 साल : किसानों के हालात बदले लेकिन नहीं मिला सम्मान

Updated at : 08 Apr 2017 7:50 AM (IST)
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चंपारण सत्याग्रह के 100 साल : किसानों के हालात बदले लेकिन नहीं मिला सम्मान

महात्मा गांधी 100 साल पहले जिस रूट से ट्रेन से चंपारण पहुंचे थे, उसी रूट पर ट्रेन से यात्रा कर मौजूदा हालात का जायजा लिया प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर के संपादक शैलेंद्र ने. सौ साल पहले महात्मा गांधी ने अंगरेजों के तीन कठिया कानून के खिलाफ चंपारण से आंदोलन की शुरुआत की थी, तब उन्होंने मुजफ्फरपुर […]

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महात्मा गांधी 100 साल पहले जिस रूट से ट्रेन से चंपारण पहुंचे थे, उसी रूट पर ट्रेन से यात्रा कर मौजूदा हालात का जायजा लिया प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर के संपादक शैलेंद्र ने.
सौ साल पहले महात्मा गांधी ने अंगरेजों के तीन कठिया कानून के खिलाफ चंपारण से आंदोलन की शुरुआत की थी, तब उन्होंने मुजफ्फरपुर से मोतिहारी तक पैसेंजर ट्रेन से यात्रा की थी. सौ साल बाद फिर से यात्रा को जीवंत बनाने की तैयारी चल रही है. इन सालों में परिस्थितियां बदल गयी हैं. देश को आजाद हुए भी 70 साल हो चुके हैं, लेकिन किसानों की स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं दिखता. अंगरेजी कानून की जगह अब कल्याणकारी योजनाओं ने ले ली है.
उनका लाभ जिन किसानों को मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता. मुजफ्फरपुर से मोतिहारी तक पैसेंजर ट्रेन से यात्रा के दौरान यह देखने को मिला. छपरा के किसान सुरेंद्र से लेकर महवल के कन्हाई प्रसाद तक से बात हुई. सबका यही कहना था कि आजादी के बाद से किसानों की स्थिति बदली है, लेकिन सम्मान नहीं मिला. मुजफ्फरपुर के प्लेटफाॅर्म नंबर पांच से रक्सौल जानेवाली पैसेंजर ट्रेन लगभग 25 मिनट की देरी से खुलती है. छह डिब्बों की ट्रेन में देश की असली तसवीर दिखती है. पूरे देश में स्वच्छता पर जोर है. ट्रेन में गंदगी का ऐसा आलम है, जैसे सालों पहले सफाई हुई हो. इंजन से सटे डिब्बे में एक बूढ़ी मां बकरी और उसका बच्चा लेकर कोने में खड़ी दिखीं. नाम पूछने पर घबराने लगीं. नरियार के रहनेवाले राजकुमार कुदाल लेकर डिब्बे के कोने में खड़े हैं. उनके तीन साथी भी ट्रेन की फर्श पर बैठे दिखे. इन लोगों काे शहर में काम नहीं मिला, इसलिए वापस गांव जा रहे हैं.
कहने लगे, रोज मुजफ्फरपुर के ब्रह्मपुरा नाके पर खड़े होते हैं. अगर काम मिलता है, तो 250 से 300 रुपये मिल जाते हैं, नहीं मिलने पर वापस घर जाना पड़ता है. रोजगार गारंटी के बारे में इन्हें पता नहीं है. शराबबंदी को ये लोग सराहते हैं. कहते हैं, पहले हमारे काफी पैसे शराब पर खर्च होते थे. अब अच्छा है. शराब मिलती नहीं, तो पैसे बच जाते हैं. गांधी जी के बारे में इन्हें सिर्फ यह मालूम है कि उन्होंने देश को आजादी दिलायी थी. कांटी के रहनेवाले रामायण प्रसाद ट्रेन में चूरन व चूसने वाली टॉपी बेचते हैं. कहते हैं, समाज बदल गया है.
अब पहले जैसी बात नहीं रही. गांधी जी जो चाहते थे, वह नहीं हो रहा है. कांटी के रमेश ट्रेन में पेड़ा बेचते हैं. इसी से रोजी-रोटी चलती है. इन्हें गांधी जी के बारे में जानकारी नहीं. चर्चा के बीच ट्रेन मोतीपुर स्टेशन पर पहुंच जाती है, जहां बीच के ट्रैक पर खड़ा किया जाता है. इससे यात्रियों को परेशानी होती है. रेलवे की यह व्यवस्था चौकानेवाली है. मोतीपुर के बाद ट्रेन महवल स्टेशन पर पहुंचती है, जहां पर प्लेटफॉर्म बन रहा है. प्लेटफॉर्म के किनारे बड़ा गड्ढा होने से यात्री ईंट का सहारा लेकर ट्रेन पर चढ़ते-उतरते हैं.
ट्रेन से उतरने के क्रम में एक महिला गिर जाती है, जिसे चोट लगती है. इस व्यवस्था के बीच सौ साल पहले की रेल याद आती है. शायद तब इस हाल में यात्रियों को नहीं छोड़ा जाता रहा होगा. इंजन भले ही भाप वाला चलता था और छोटी लाइन थी, लेकिन यात्रा ऐसी पीड़ा देने वाली नहीं रही होगी. रेलवे लाइन की दोनों ओर पके गेहूं के खेत ग्रामीण परिवेश व भारत की आत्मा के दर्शन कराते हैं. दो बार गिरे ओले की वजह से गेहूं के पौधों में बाली नहीं दिखती है, जो किसान और किसानी की हालत बयान करती है. इसी सोच के बीच हम आगे बढ़ रहे होते हैं, तभी पास में बैठे गौरी शंकर बगल से गुजरने वाले फोरलेन की तरफ ध्यान देने को कहते हैं. कहने लगते हैं कि सौ साल में छोटी से बड़ी लाइन हो गयी.
ट्रैक नहीं बढ़ सका, जबकि सड़क सिंगल लेन से फोरलेन हो गयी है. महवल स्टेशन पर ही कन्हाई प्रसाद ट्रेन में बैठते हैं. चाची, भाभी और पत्नी के साथ पिपराकोठी में लगनेवाले मेला देखने जा रहे हैं. देखते ही कहने लगते हैं कि अभी कष्ट सहेंगे, तभी आगे सुविधा मिलेगी. खेती करके परिवार चलाने वाले कन्हाई कहते हैं कि किसानों की स्थिति बदली है. हमारे पास पैसे भले नहीं हैं, लेकिन हम भूखे नहीं रहते हैं.
खाने के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं हैं. घर में अन्न है, जो हर जरूरत में काम आता है. कन्हाई किसानों को सम्मान नहीं मिलने का सवाल भी उठाते हैं. कहते हैं कि क्या सरकारी अधिकारी अच्छे कपड़े वालों को ही सम्मान देना जानते हैं. हम जाते हैं, तो कोना दिखा दिया जाता है. कहा जाता है, वहां बैठ जाओ. अभी तुम्हारी बात सुनते हैं और फिर घंटों छोड़ दिया जाता है. क्या कपड़ा किसी के स्टेटस का पैमाना हो सकता है? कन्हाई की बात सुन कर छपरा के रहनेवाले सुरेंद्र भी बोल पड़ते हैं. कहते हैं, हमारा परिवार सात लोगों का है. राशन कार्ड अब तक नहीं बना. पिछले साल बाढ़ आयी थी, सरकार ने छह-छह हजार रुपये भेजे. हम लोगों को नहीं मिले. अगर हम बीडीओ-सीओ के यहां चक्कर लगायेंगे, तो हमारे बच्चे कैसे खायेंगे? हमें सरकारी सहायता कैसे मिलेगी? यह तय होना चाहिए. वह अफसरशाही पर सवाल उठाते हैं? कहते हैं कि पहले अंगरेजों का डर था, अब अफसरी व्यवस्था हमें डराती है.
शिक्षा सुधरे, सब ठीक हो जायेगा
गांधी संग्रहालय सह स्मारक समिति के सचिव ब्रज किशोर सिंह कहते हैं कि सौ साल पहले गांधी जी चंपारण में किसानों की समस्या के संघर्ष के लिए आये थे. उन्होंने जब यहां देखा, तो पाया कि सब समस्याओं के मूल में अशिक्षा है. इसी वजह से गांधी जी ने यहां कई बुनियादी विद्यालय खोले और स्थिति को बदलने की कोशिश की, लेकिन आज सौ साल के बाद भी स्थिति में सुधार नहीं दिखता है. मुझे लगता है कि उस समय से हालात खराब हुए हैं. चंपारण शताब्दी वर्ष में अगर हम शिक्षा व्यवस्था के बदलाव का संकल्प लें, तो स्थिति बदल सकती हैं और हम जिन समस्याओं की बात कर रहे हैं, चाहे वो किसानों से जुड़ी हों या फिर समाज से, सब ठीक हो जायेंगी.
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