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शहाबुद्दीन जैसे हिस्ट्रीशीटर को जमानत नहीं दे सकते : सुप्रीम कोर्ट

Updated at : 28 Sep 2016 10:22 PM (IST)
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शहाबुद्दीन जैसे हिस्ट्रीशीटर को जमानत नहीं दे सकते : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : पटना हाइकोर्ट से पूर्व सांसद शहाबुद्दीन की जमानत होने के बाद से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने तक बिहार सरकार को विरोधियों के साथ-साथ अदालत के भी कड़े प्रश्नों का सामना करना पड़ रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जब शहाबुद्दीन की ओर से कोर्ट को यह बताया गया कि हमेशा उन्हें […]

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नयी दिल्ली : पटना हाइकोर्ट से पूर्व सांसद शहाबुद्दीन की जमानत होने के बाद से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने तक बिहार सरकार को विरोधियों के साथ-साथ अदालत के भी कड़े प्रश्नों का सामना करना पड़ रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जब शहाबुद्दीन की ओर से कोर्ट को यह बताया गया कि हमेशा उन्हें हिस्ट्रीशीटर कहा जाता है लेकिन इसके कोई साक्ष्य नहीं हैं तो उसके बाद उन्हें भी जमकर कोर्ट ने फटकार लगायी. कानून के जानकारों के मुताबिक सुनवाई की पीठ की अध्यक्षता कर रहे न्यायाधीश पीसी घोष ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दो आदेश हैं जिनमें उन्हें हिस्ट्रीशीटर माना गया है. कोर्ट ने कहा कि क्या ये गलत कहे जा सकते हैं. कोर्ट ने यह भी कहा कि हम इस बारे में बहुत स्पष्ट हैं कि हिस्ट्रीशीटर को जमानत नहीं दी जा सकती. इतना कहने के बाद कोर्ट ने गुरुवार तक सुनवाई को स्थगित कर दी.

बिहार सरकार को फटकार

कानूनी विशेषज्ञों ने बताया कि इससे पूर्व सुनवाई करते हुए न्यायाधीश घोष और जस्टिस अमिताभ की पीठ ने बिहार सरकार से पूछा कि यह बताया जाये कि क्या शहाबुद्दीन की जमानत अर्जी की सुनवाई के समय अभियोजन अधिकारी कोर्ट में गए थे. बिहार सरकार की ओर से जो दलील पेश की गयी उसके मुताबिक पटना हाइकोर्ट को यह बताया गया था कि ट्रायल शुरू होने में काफी देरी शहाबुद्दीन के कारण ही हुई है. क्योंकि उन्होंने हत्या के मामले में संज्ञान लेने के फैसले को कोर्ट में चुनौती दे दी थी. पूरा रिकार्ड वहां चला गया और ट्रायल शुरू नहीं हो पाया. विशेषज्ञों के मुताबिक कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि राज्य इतना अशक्त कैसे हो सकता है. उसके बाद बिहार सरकार की ओर से वकील ने कहा कि इस मामले में वह अशक्त थे. उसके बाद कोर्ट ने कहा कि आप राज्य हैं, आप अशक्त कैसे हो सकते हैं.

राज्य नींद से क्यों नहीं जागा-सुप्रीम कोर्ट

विशेषज्ञों ने जानकारी देते हुए कहा कि कोर्ट ने कहा -यह केस इतना महत्वपूर्ण है और कई बार यह सुप्रीम कोर्ट भी आया है. पीठ के मुताबिक क्या अभियोजन अधिकारी को यह जानकारी नहीं होने चाहिए. कानूनी जानकार जो कोर्ट रूम में मौजूद थे उनकी माने तो सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया. सुनवाई कर रही पीठ ने कहा कि उन्हें आश्चर्य है कि शहाबुद्दीन के खिलाफ 45 आपराधिक केस लंबित हैं और इससे पूर्व सभी मामलों में उन्हें जमानत मिली लेकिन राज्य नींद में था. राज्य की नींद तब खुली जब हत्या के केस में शहाबुद्दीन को जमानत मिली.

राज्य सरकार गलती स्वीकारने की ओर

कानूनी जानकारों की माने तो कोर्ट सुनवाई के दौरान बिहार सरकार के वकील ने कहा कि सरकार की ओर से हुई गलतियों को वे सही नहीं ठहरा रहे हैं. जो हो गया वह तो हो गया. अब पीठ और सुप्रीम कोर्ट मामले में अपना आदेश पारित करे और स्थिति को ठीक किया जाए. वहीं दूसरी ओर चंदा बाबू की ओर से प्रशांत भूषण ने बहस की और उन्होंने शहाबुद्दीन की जमानत रद्द करने का आग्रह किया. भूषण ने कोर्ट से कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 210 और 2015 के फैसले को बताये जिसमें शहाबुद्दीन की जमानत को रद्द करने के आदेश दिये थे. शहाबुद्दीन की ओर से वकीलों ने कहा कि उनके खिलाफ हत्या के पांच मामलों को शामिल किया गया है. उन्होंने कहा कि इन मामलों के चार्जशीट में उनका नाम तक नहीं है. शहाबुद्दीन की ओर से बार-बार हिस्ट्रीशीटर कहने का मामले उठाते हुए बिहार में कोई भी घटना होने पर उनके मत्थे मढ़ देने की बात कही गयी.

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