800 साल पुराने ‘बोली कुआं’ पर सूख रहा 'गौरव', 7 मंजिला में 4 मलबे में दबी; संरक्षण की राह देख रही ऐतिहासिक धरोहर
800 साल पुरानी ‘बोली कुआं
पटना की सबलपुर में 800 साल पुरानी एक दुर्लभ सात मंजिला बावली इतिहास के पन्नों में खो रही है. संरक्षण के अभाव में यह ऐतिहासिक धरोहर बदहाल हो रही है, जबकि वैज्ञानिक खुदाई से इसका अनजाना इतिहास सामने आ सकता है.
Patna Boli Kuan : पटना. राजधानी पटना का इतिहास सिर्फ प्राचीन पाटलिपुत्र तक सीमित नहीं है. शहर के दीदारगंज थाना क्षेत्र से करीब दो किलोमीटर पूर्व फतुहा मुख्य मार्ग पर स्थित सबलपुर मोहल्ले में करीब 800 वर्ष पुरानी एक ऐतिहासिक बावली आज भी अपने भीतर कई रहस्य समेटे हुए है. स्थानीय लोग इसे बौली कुआं के नाम से जानते हैं. 12वीं-13वीं शताब्दी में निर्मित मानी जाने वाली यह सात मंजिला सीढ़ीनुमा बावली पूर्वी भारत की दुर्लभ स्थापत्य धरोहरों में शामिल बतायी जाती है. लेकिन संरक्षण और देखरेख के अभाव में यह ऐतिहासिक धरोहर अब धीरे-धीरे बदहाल होती जा रही है.

बावली के पास बनी सीढ़ीनुमा संरचना से इसके भीतर उतरने का रास्ता है. स्थानीय मान्यता है कि कभी इन्हीं सीढ़ियों से सात भूमिगत मंजिलों तक पहुंचा जा सकता था. हालांकि समय के साथ मिट्टी और मलबा जमा होने के कारण अब केवल तीसरी मंजिल तक ही पहुंचना संभव है. नीचे की चार मंजिलें मलबे में दब चुकी हैं. गर्मी के दिनों में जब गंगा का जलस्तर नीचे जाता है, तब बावली का कुछ और हिस्सा दिखाई देता है. बरसात में जलभराव बढ़ने के कारण इसकी केवल ऊपरी मंजिल ही नजर आती है.
सात मंजिला बावली, अब सिर्फ तीन मंजिल तक पहुंच
स्थानीय लोगों के अनुसार, जमीन धंसने और लगातार मिट्टी-मलबा जमा होने से बावली की निचली चार मंजिलें दब गयी हैं. स्थानीय बुजुर्ग राज वल्लभ राय बताते हैं कि गर्मियों में बावली की तीन मंजिलें दिखाई देती हैं, जबकि बारिश के मौसम में पानी भर जाने के कारण केवल ऊपरी एक मंजिल ही नजर आती है.
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आज इस ऐतिहासिक संरचना की दीवारों पर जगह-जगह दरारें दिखाई देती हैं. कई नक्काशीदार झरोखे टूट चुके हैं. पूरा परिसर झाड़-झंखाड़ और कचरे से घिरा है. ऐसे में कभी अपनी स्थापत्य कला के लिए पहचान रखने वाली यह बावली अब संरक्षण के अभाव में लगातार कमजोर होती जा रही है.
गुजरात और राजस्थान की बावड़ियों से मिलती है बनावट
इतिहासकार एवं पुराविद अरविंद महाजन के अनुसार, सबलपुर की बावली की वास्तु योजना इसे 12वीं-13वीं शताब्दी की धरोहर होने का संकेत देती है. इसकी संरचना राजस्थान और गुजरात की प्रसिद्ध बावड़ियों की तर्ज पर बनी प्रतीत होती है. अष्टकोणीय वास्तु योजना गुजरात के पाटन स्थित रानी की वाव और अडालज बावड़ी से मिलती-जुलती है.
उनके अनुसार, उस दौर में बावलियां केवल पानी जमा करने के लिए नहीं बनायी जाती थीं. ये भीषण गर्मी में लोगों को राहत देने के साथ यात्रियों और सैनिकों के विश्राम स्थल के रूप में भी इस्तेमाल होती थीं. सबलपुर बावली को लेकर अभी कोई स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. हालांकि स्थानीय लोग पास स्थित प्राचीन विष्णु मंदिर के कारण इसे राजा मानसिंह से जोड़ते हैं.
बावली की मूल सजावट का अधिकांश हिस्सा अब नष्ट हो चुका है. इसके बावजूद इसकी माइनरिंग पर उल्टे कमल दल की पंक्ति आज भी दिखाई देती है, जो इसके पुराने स्थापत्य की झलक देती है.
तीन फीट के शिलाखंड में छिपा है एक रहस्य
बावली के बाहर करीब तीन फीट लंबा और तीन फीट चौड़ा एक वर्गाकार शिलाखंड भी पड़ा हुआ है. इस पर ज्यामितीय आकृति में एक रहस्यमयी नक्शा उकेरा गया है. स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि यह आकृति बावली में छिपे किसी गुप्त खजाने की ओर संकेत करती है.
हालांकि इस बारे में कोई प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है. कुछ पुरातत्वविद इसे विष्णु का श्रीयंत्र या कोई मांगलिक यंत्र मानते हैं. इसके पीछे वजह यह भी बतायी जाती है कि बावली के ठीक बगल में एक बेहद प्राचीन विष्णु मंदिर स्थित है. स्थानीय लोगों के अनुसार, इसे बिहार का एकमात्र विष्णु मंदिर भी माना जाता है.
वैज्ञानिक खुदाई से सामने आ सकता है छिपा इतिहास
पुराविद अरविंद महाजन का कहना है कि यदि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण या राज्य पुरातत्व निदेशालय इस बावली को संरक्षण में लेकर वैज्ञानिक तरीके से खुदाई कराए, तो मलबे में दबी चार मंजिलों को दोबारा उजागर किया जा सकता है. इससे न सिर्फ इस ऐतिहासिक संरचना का वास्तविक स्वरूप सामने आएगा, बल्कि पटना के इतिहास से जुड़े कई अनछुए पहलुओं पर भी जानकारी मिल सकती है.
स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को अब तत्काल संरक्षण की जरूरत है. यदि समय रहते इसकी सुध नहीं ली गयी, तो आने वाली पीढ़ियां पटना की इस अनमोल धरोहर को सिर्फ तस्वीरों और इतिहास के पन्नों में ही देख पाएंगी.
पटना जैसे तेजी से फैलते शहर में 800 साल पुरानी यह बावली इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है. जरूरत इस बात की है कि इसे महज एक पुराने कुएं के रूप में देखने के बजाय ऐतिहासिक और स्थापत्य धरोहर के तौर पर संरक्षित किया जाए, ताकि इसके भीतर दबी कहानी और चार मंजिलों का रहस्य आने वाली पीढ़ियों के सामने आ सके.
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