पटना : पीएचसी से पीएमसीएच तक डॉक्टरों का एक ही हाल, देर से आना और पहले जाना
Updated at : 27 Aug 2019 7:51 AM (IST)
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पटना : स्वास्थ्य सेवाओं पर हर साल अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी सरकार डाॅक्टरों को समय पर अस्पताल पहुंचाने में अब तक नाकाम रही है. यह हाल स्वास्थ्य महकमे के मुखिया के गृह जिला तक का है. केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री के संसदीय क्षेत्र बक्सर का हाल भी ठीक नहीं है. राज्य के सबसे […]
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पटना : स्वास्थ्य सेवाओं पर हर साल अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी सरकार डाॅक्टरों को समय पर अस्पताल पहुंचाने में अब तक नाकाम रही है. यह हाल स्वास्थ्य महकमे के मुखिया के गृह जिला तक का है. केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री के संसदीय क्षेत्र बक्सर का हाल भी ठीक नहीं है.
राज्य के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच से लेकर पीएचसी तक में डाॅक्टरों की कमी है. राज्य की 95% से अधिक की आबादी सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के भरोसे है. इसमें कोई शक नहीं है कि पिछले डेढ़ दशक में राज्य में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ है.
इसी का परिणाम है कि 2006 में जहां हर महीने औसतन 39 मरीज सरकारी अस्पताल में पहुंचते थे, वहीं अब यह संख्या 11 हजार के करीब पहुंच चुकी.
राज्य के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर सदर और मेडिकल कॉलेज अस्पताल तक के ओपीडी में रोजाना सैकड़ों मरीज पहुंचते हैं. अस्पताल में काम की दवाएं भी मिल जाती हैं, लेकिन मरीजों और उनके परिजनों को डॉक्टरों की कमी से जूझना पड़ता है. डॉक्टरों की कमी राज्य के हर अस्पताल में है. प्रभात खबर की टीम ने सोमवार को राज्य के सरकारी अस्पतालों के ओपीडी का जायजा लिया. कमोबेश सभी जगह मरीजों की यही शिकायत थी कि डाॅक्टर नहीं है.
काफी समय लगता है. अस्पतालों में जेनेरिक दवा की दुकान नहीं रहने से मरीज बाजार से महंगी दवाएं खरीदने की मजबूरी हैं. एंटी रैबीज और सर्पदंश की दवी की भी कमी है. सामान्य सुविधाओं की भी कमी है. अस्पताल प्रशासन का भी यहीं कहना रहा कि जरूरत के हिसाब से डाॅक्टर नहीं हैं.
सरकारी अस्पतालों में ओपीडी आठ बजे से लेकर दोपहर दो बजे तक चलता है, लेकिन मरीजों का सबसे अधिक दबाव 10 बजे से करीब एक बजे तक रहता है. इसका एक बड़ा कारण डाॅक्टरों का समय पर नहीं पहुंचना है.
मरीजों की संख्या अधिक रहने पर ओपीडी में 10 बजे के बाद अफरातफरी की स्थिति हो जाती है. पारा मेडिकल स्टाफ की कमी का असर सामान्य जांच से लेकर दवा वितरण पर भी पड़ता है. गया के जयप्रकाश नारायण सदर अस्पताल की बात करें तो कई मरीजों के परिजन पंजीयन कराने के बाद डॉक्टर के चैंबर में पहुंचने पर पता चला कि डॉक्टर ही नहीं हैं. स्त्री रोग विभाग के ओपीडी में मरीज अच्छी-खासी संख्या थी, लेकिन डाॅक्टर गायब थे.
अस्पताल उपाधीक्षक डॉ चंद्रशेखर प्रसाद ने बताया कि यहां हर रोज करीब 700 से 800 मरीजों का आना होता है. यहां डॉक्टरों की संख्या 29 होनी चाहिए, लेकिन हैं सिर्फ 10.
राज्य के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच में सुबह के 10 बजे ओपीडी में इलाज कराने के लिए निबंधन काउंटर और ओपीडी में मरीजों की भारी भीड़ लगी थी.
सर्जरी वार्ड के एचओडी डाॅ एनपी नारायण मरीजों का इलाज कर रहे थे, लेकिन उनकी बगल वाले रूम में जिन सीनियर डॉक्टरों की ड्यूटी लगी थी, वे नदारद थे. आठ से 10 मरीज और उनके परिजन डॉक्टर के आने का इंतजार करते दिखे. पीएमसीएच में नि:शुल्क दवा काउंटर की व्यवस्था है, लेकिन यह समय से पहले बंद हो जाता है. मुजफ्फरपुर सदर अस्पताल का ओपीडी खुलता तो समय पर है, लेकिन यहां डॉक्टर बैठते अपनी मर्जी से हैं.
सोमवार को सुबह 9:30 बजे तक हड्डी, आंख और शिशु विभाग के ओपीडी में डॉक्टर मौजूद नहीं थे. उत्तर बिहार के सबसे बड़े अस्पताल डीएमसीएच के ओपीडी 10 बजे तक मनोरोग, आरएनटीसीपी व चेस्ट विभाग में सीनियर डॉक्टर नजर नहीं आ रहे थे. पूर्व बिहार से सबसे बड़े अस्पताल जेएलएनएमसीएच के ओपीडी में भी डाॅक्टर समय पर नहीं पहुंचते.
पीएमसीएच
सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ एनपी नारायण इलाज कर रहे थे, पर बगल वाले रूम में नदारद थे सीनियर
नि:शुल्क दवा काउंटर पर मिल रही थीं 70% दवाएं, पर एक घंटा पहले बंद कर दिया गया काउंटर
एसी खराब होने से ओपीडी में मरीजों का था बुरा हाल
एनएमसीएच
सुबह 11 बजे के बाद सीनियर डॉक्टर पहुंचे ओपीडी में, बड़ी संख्या में मरीज करते रहे इंतजार
ओपीडी मरीजों के लिए 84 तो भर्ती मरीजों के लिए 74 तरह की दवाएं उपलब्ध
रजिस्ट्रेशन कराने को धूप में लगी थीं लंबी कतारें
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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