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स्कूल की जमीन पर माफिया का कब्जा, मंदिर में लगती हैं कक्षाएं

Updated at : 07 May 2019 9:33 AM (IST)
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स्कूल की जमीन पर माफिया का कब्जा, मंदिर में लगती हैं कक्षाएं

शहर के गुलजारबाग स्थित तुलसी मंडी इलाके में एक ऐसा सरकारी स्कूल भी है, जो एक देवी मंदिर में चलता है. मंदिर में बजने वाली शंख और घंटियों की अवाज के बीच यहां रोज जन-गण-मन (राष्ट्रगान) का स्वर भी गूंजता है. राष्ट्र प्रेम, श्रद्धा और शिक्षा की गंगा यहां एक साथ बहती है. बच्चों की […]

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शहर के गुलजारबाग स्थित तुलसी मंडी इलाके में एक ऐसा सरकारी स्कूल भी है, जो एक देवी मंदिर में चलता है. मंदिर में बजने वाली शंख और घंटियों की अवाज के बीच यहां रोज जन-गण-मन (राष्ट्रगान) का स्वर भी गूंजता है. राष्ट्र प्रेम, श्रद्धा और शिक्षा की गंगा यहां एक साथ बहती है. बच्चों की खिलखिलाहट देवालय को हमेशा गुलजार रखती है. करीब 50 वर्ष पुराने राजकीय प्राथमिक विद्यालय की बिल्डिंग का एक हिस्सा चंदे के पैसे से बना है.
चंदे में मंदिर के श्रद्धालुओं का सबसे बड़ा योगदान है. हालांकि दानदाताओं में जनप्रतिनिधि और धनी व्यक्ति एक भी नहीं हैं. अधिकतर चंदा देने वाले लोग बेहद साधारणवर्ग के हैं. राजदेव पांडेय की रिपोर्ट स्कूल पूरी तरह सोशल ऑडिट के दायरे मेंएक साल पहले तक यह स्कूल झोंपड़ी में चलता था. भवन इसी साल पक्का बना है. दो शिक्षक हैं. विभाग ने केवल इतने ही शिक्षक पदस्थ किये हैं. हालांकि तीन महिला रसोइया हैं. दरअसल इससे पहले कुछ वर्षों में यहां 200 से अधिक बच्चे थे, उनको देखते हुए इतने रसोइयों की नियुक्ति हुई थी. चूंकि प्रभात खबर की टीम अचानक इस स्कूल में पहुंची थी, इसलिए मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता भी सामने आ गयी. एकदम उजला साफ सुथरा चावल और दाल भी अच्छी तरह पकायी गयी थी.
बेहद सफाई से थालियों में ये भोजन परोसा गया था. यह भोजन उसी हॉल में एक तरफ बनाया जाता है, जहां बच्चे पढ़ते हैं. खास बात यह बतायी गयी कि बच्चे सुबह साढ़े छह बजे से स्कूल बंद होने तक मौजूद जरूर रहते हैं. पूरे स्कूल पर स्थानीय लोगों की बाकायदा नजर रहती है. दरअसल यह स्कूल सोशल ऑडिट के दायरे में है. जानकारों का कहना है कि ऐसे बहुत कम स्कूल हैं, जहां समाज का इतना सकारात्मक दखल है.
जमीन पर दबंग बनने नहीं दे रहे स्कूल बिल्डिंग
पटना. इस स्कूल की बिल्डिंग बनाने के लिए तुलसी मंडी के निकट ही पुलिस मोहल्ला इलाके में करीब एक कठ्ठे से अधिक जमीन आवंटित भी की गयी. प्रभारी हेडमास्टर ने बाकायदा शासन से बजट भी हासिल कर लिया.
बालू, ईंट और दूसरी निर्माण सामग्री भी खरीद ली गयी, लेकिन कुछ स्थानीय दबंगों ने इसमें अड़ंगा डाल दिया. निहित स्वार्थ के चलते अफसरों पर अनुचित दबाव बनाया गया. अंत में स्कूल नहीं बनाया जा सका. चूंकि अड़ंगा डालने वाले लोग दबंग हैं, इसलिए स्थानीय लोग भी खुलकर नहीं बोल पाते हैं. यही वजह है कि इस स्कूल के पास अब भी अपनी कोई बिल्डिंग नहीं है.
क्या कहते हैं निवासी | जनप्रतिनिधियों से मदद नहीं मिल सकी
चंदे के पैसे से बनवाये गये भवन में ही एक ओर स्कूल के लिए पक्का हॉल बनवाया गया है. स्कूल में गरीब परिवारों के बच्चे पढ़ रहे हैं. इस मोहल्ले के लिए यही काफी है. हालांकि इस स्कूल को जनप्रतिनिधियों की तरफ से कोई मदद नहीं मिल सकी है.
मुन्ना पासवान,
स्थानीय निवासी तुलसी मंडी.
इस स्कूल के टीचर काफी मेहनत करते हैं. बच्चे भी खूब आते हैं. दिक्कत यह है कि इतनी छोटी जगह में बच्चों को पढ़ने में दिक्कत आती होगी. इसलिए बच्चों को पढ़ाई के लिए और जगह मिलनी चाहिए. सरकार को इस तरफ ध्यान जरूर देना चाहिए.
लक्ष्मी देवी,
स्थानीय निवासी, तुलसी मंडी.
लोगों ने चंदा देकर इस स्कूल के लिए यह भवन बनाया है. हालांकि इस स्कूल के पास अपना भवन होना चाहिए. पढ़ाई अच्छी होती है, लेकिन बच्चों को बैठने के लिए जगह नहीं है. टीचर भी नियमित आते हैं. पढ़ाई से कोई शिकायत नहीं है.
विशुन मेहतो,
स्थानीय निवासी, तुलसी मंडी.
स्कूल पुराना है. अभी तक यह स्कूल झोंपड़ी में चलता था. अब स्कूल और चंदा दाताओं की मदद से पक्का हॉल भी बन गया है, लेकिन इसमें कितने बच्चे बैठेंगे? इसलिए इस स्कूल की अपनी बिल्डिंग होनी चाहिए. समूचे मोहल्ले के लोगों की यह आम राय है.
शिव कुमार,
स्थानीय निवासी, तुलसी मंडी
निश्चित रूप से मंदिर की जमीन पर स्कूल बना है. स्थानीय लोगों का भी इसमें योगदान है. स्कूल की बिल्डिंग बनाने के लिए पैसा आया था,लेकिन किन्हीं कारणों से वह खर्च नहीं हो सका. इस दिशा में हमने काफी प्रयास किये, लेकिन कुछ लोगों ने अड़ंगेबाजी कर यह काम नहीं होने दिया. फिलहाल हमारा काम पढ़ाई कराना है, वह काम हम करा रहे हैं, जहां तक किताबों आदि के पैसों की बात है, अधिकतर बच्चों के खाते में डाले गये हैं, हालांकि कई बच्चे हैं, जिनके पास किताबें नहीं हैं, क्योंकि उनके अभिभावकों ने दूसरे काम में वह पैसे खर्च कर लिये. कुछ बच्चों के खाते खुलवाये जा रहे हैं. कुछ ही दिनों में उनके खाते में राशि पहुंच जायेगी.
बच्चों के खाते नहीं इसलिए नहीं पहुंची राशि
जकीय प्राथमिक विद्यालय के कई बच्चे ऐसे मिले, जिनके खाते में अब तक पुस्तक और दूसरी
योजनाओं का पैसा नहीं पहुंचा है. दरअसल इन बच्चों के खाते नहीं हैं. बेहद गरीब वर्ग के होने के चलते ऐसे बच्चों के अभिभावकों के बैंक खाते भी नहीं है. इसलिए कुछ बच्चे अपने अधिकार से वंचित रह गये हैं.
हालांकि स्कूल प्रबंधन ने हाल ही में बैंक खाते खुलवाने के लिए अभिभावकों की सूची निकटवर्ती बैंक को भेजी है. एक बच्ची ने बताया कि उसके पिताजी जब बैंक खाता खुलवाने गये, तो बैंक ने कहा पहले पैसे लाओ, उसके बाद खाता खुलवाओ. इस तरह खाता खुलवाने में बाधा बन रहे तकनीकी पेचों ने बच्चों को डाइरेक्ट कैश ट्रांसफर वाली तमाम योजनाओं से वंचित कर रखा है.
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