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''नहाय-खाय'' के साथ शुरू हुआ लोक आस्था का महापर्व छठ

Updated at : 11 Nov 2018 10:50 AM (IST)
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''नहाय-खाय'' के साथ शुरू हुआ लोक आस्था का महापर्व छठ

पटना : साक्षात भगवान भास्कर की आराधना का चार दिवसीय अनुष्ठान छठ पूजा की शुरुआत आज रविवार को नहाय-खाय के साथ ही प्रारंभ हो गया. राजधानी पटना समेत राज्य के अन्य जिलों में भी नदियों-तालाबों पर स्थित घाटों पर हजारों की तादाद में श्रद्धालुओं ने अपने परिजनों के साथ डुबकी लगायी. स्नान करने का बाद […]

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पटना : साक्षात भगवान भास्कर की आराधना का चार दिवसीय अनुष्ठान छठ पूजा की शुरुआत आज रविवार को नहाय-खाय के साथ ही प्रारंभ हो गया. राजधानी पटना समेत राज्य के अन्य जिलों में भी नदियों-तालाबों पर स्थित घाटों पर हजारों की तादाद में श्रद्धालुओं ने अपने परिजनों के साथ डुबकी लगायी. स्नान करने का बाद महिलाएं भगवान सूर्य की पूजा अर्चना भी कर रही हैं. इस दौरान छठ के गीत भी गुनगुना रही हैं. चारों ओर छठ के गीत गूंज रहे हैं. व्रतियों द्वारा गाये जा रहे छठ के गीत से पूरा माहौल भक्तिमय हो गया है. पहले दिन छठ व्रत करने वाले पुरुषों और महिलाओं ने अंत:करण की शुद्घि के लिए नदियों, तालाबों और विभिन्न जलाशयों में स्नान करते हैं. इसके बाद अरवा चावल, चने की दाल और लौकी (कद्दू) की सब्जी को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की मान्यता है.

कार्तिक माह में मनाये जाने वाला लोक आस्था का महापर्व छठ का हिंदू धर्म में एक विशेष और अलग स्थान है. कहा जाता है कि इस पर्व में सूर्य की पूजा होती है. शुद्धता व पवित्रता इस पर्व का मुख्य अंग है. प्रकृति के अवयवो में से एक जल स्रोतों के निकट छठ पूजा का आयोजन होता है. व्रती द्वारा पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है. इसी क्रम में उल्लेखनीय है कि संभवतः ये अपने आप में ऐसा पर्व है जिसमें अस्ता चलगामी व उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है व उनकी वंदना की जाती है.

सांझ-सुबह की इन दोनों अर्घ्यों के पीछे हमारे समाज में एक आस्था काम करती है. पौराणिक कथा के अनुसार सूर्य देव भगवान की दो पत्नियां हैं- ऊषा और प्रत्युषा. सूर्य के सुबह की किरण ऊषा होती है और सांझ की प्रत्युषा. अतः सांझ-सुबह दोनों समय अर्घ्य देने का उद्देश्य सूर्य की इन दोनों पत्नियों की अर्चना-वंदना होती है. दिखावा और आडंबर से अलग हटकर इस पर्व का आयोजन होता है.

व्रतियों के द्वारा की जाती है लंबी उपासना
48 घंटे के लंबे उपवास के दौरान पानी में खड़े होकर सूर्य देवता की आराधना की जाती है. अस्ता चलगामी सूर्य व उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही इस महाअनुष्ठान का समापन होता है. आधुनिकता से अलग छठ पर्व में मिट्टी और कृषि उत्पादनों का शुरू से लेकर अंत तक इस्तेमाल होता है. मिट्टी के चूल्हों पर खरना का प्रसाद व पकवान, बांस से निर्मित डाला को सजाकर ही छठ व्रती अपने परिवार के साथ घाटों की और प्रस्थान करते है. जबकि, पूजा सामग्री में भी पानी सिंघाड़ा, ईख, हल्दी, नारियल, नींबू के अलावे मौसमी फल और गाय के दूध की अनिवार्यता होती है. बदलते समय और आधुनिकता से छठ पर्व पर कोई असर नहीं हुआ है. घर से बाहर नदी और तालाबों के निकट मनाये जाने से एक सामाजिक वातावरण का माहौल भी स्थापित होता है. छठ के मौके पर अन्य प्रदेश और विदेश में रहने वाले भी घर लौटते है.

प्रकृति से काफी नजदीक है पर्व
लोक आस्था का यह महापर्व पूजन में प्रयोग की जाने वाली सामग्री प्रकृति के अनुकूल और समाज को जोड़ने वाली होती है. छठ पर्व सूर्य की ऊर्जा की महत्ता के साथ जल और जीवन के संवेदनशील रिश्ते को पुष्ट करता है. पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है छठ अस्ता चलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के बाद पुन: अगले दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ पर्व संपन्न होता है. लोक आस्था का यह महापर्व न सिर्फ भक्तों में आस्था का प्रतीक है बल्कि यह पावन पर्व प्रत्येक व्यक्ति को पर्यावरण के साथ हमारी संस्कृति से सीधे तौर पर जोड़ने का कार्य करता है. पूजा के दौरान महिलाएं अपने गीतों के माध्यम से भगवान भास्कर और छठी मइया के कृत्यों का बखान करती हैं. गीत गाने की यह परंपरा सीधे तौर पर हमारी संस्कृति और सभ्यता की पहचान है.

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