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मानसून की आहट के साथ बिहार में बाढ़ का खतरा, आपदा से निबटने की कवायद तेज

Updated at : 17 Jun 2018 3:07 PM (IST)
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मानसून की आहट के साथ बिहार में बाढ़ का खतरा, आपदा से निबटने की कवायद तेज

पटना : मानसून की आहट के साथ ही बिहार में बाढ़ की आशंका डराने लगती है. पिछले वर्ष की बाढ़केकहर से चिंतित प्रशासन का इस बार यह प्रयास है कि बाढ़ के प्रकोप को भयावह स्थिति तक न पहुंचने दिया जाये इसलिए हर जिले में इस आपदा से निपटने के उपाय किए जा रहे हैं. […]

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पटना : मानसून की आहट के साथ ही बिहार में बाढ़ की आशंका डराने लगती है. पिछले वर्ष की बाढ़केकहर से चिंतित प्रशासन का इस बार यह प्रयास है कि बाढ़ के प्रकोप को भयावह स्थिति तक न पहुंचने दिया जाये इसलिए हर जिले में इस आपदा से निपटने के उपाय किए जा रहे हैं. पिछले दो वर्ष से बिहार में बाढ़ की स्थिति में बदलाव देखने में आया है. वर्ष 2016 में जहां गंगा किनारे के जिले बाढ़ की चपेट में आये थे. वहीं, पिछले वर्ष आयी भयावह बाढ़ ने कुछ ऐसे जिलों को भी अपनी चपेट में ले लिया जहां अमूमन बाढ़ नहीं आती है.

पिछले दिनों राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बाढ़ पूर्व तैयारियों की समीक्षा के दौरान बताया कि वर्ष 2016 में गंगा किनारे के जिलों में भी बाढ़ आयी इसलिए गोलघर से दानापुर तक के इलाके को बाढ़ से बचाने के लिए विशेष उपाय करने की जरूरत है. इस बैठक में मुख्यत: इस बात पर विचार किया गया कि बाढ़ आने की स्थिति में उससे निपटने के लिए क्या उपाय किये जायेंगे. कितने गोताखोर, कितनी नौका की जरूरत होगी और बाढ़ पीड़ितों को जल्द से जल्द सुरक्षित स्थानों पर कितनी जल्दी तथा किस तरह पहुंचाया जायेगा और उनके लिए कौन सी सुविधाओं की व्यवस्था की जायेगी. ऐसे में यह प्रश्न भी उठता है कि बाढ़ से निबटने की बजाय उस पर नियंत्रण के उपाय किये जाने से समस्या को स्थायी रूप से समाप्त किया जा सकता है.

दरअसल, ऐसा माना जाता है कि भारत और नेपाल के बीच सप्तकोसी हाई डैम परियोजना और सनकोसी डायवर्जन परियोजना के अब तक कार्यान्वित नहीं होने के कारण बिहार को हर साल बाढ़ की विभीषिका झेलनी पड़ती है. बिहार में बाढ़ की समस्या के निदान के लिए दीर्घकालीन उपाय के तौर पर कोसी नदी पर जलाशय का निर्माण आवश्यक माना गया और वर्ष 1991 में भारत ओर नेपाल के बीच प्रधानमंत्री स्तर पर इस पर सहमति बनने तथा संयुक्त विशेषज्ञ दल गठित किये जाने के बाद सप्तकोसी हाई डैम परियोजना और सनकोसी डायवर्जन योजना के तहत नेपाल के वराहक्षेत्र में सप्तकोसी पर 269 मीटर ऊंचा बांध, सनकोसी नदी पर कुरूले के समीप 49 मीटर बांध, कोसी नदी पर चतरा में एक बराज, सनकोसी नदी पर एक डायवर्जन टनल और नहर प्रणालियां विकसित किया जाना प्रस्तावित है.

इन परियोजनाओं के निर्माण की प्रारंभिक रूपरेखा तैयार करने के लिए 2004 में ही भारत-नेपाल संयुक्त परियोजना कार्यालय स्थापित कियेगये और नेपाल में भी इसके संबद्ध कार्यालय स्थापित कियेगये. दोनों देशों के संयुक्त विशेषज्ञ दलों की अब तक 15 बैठकें हो चुकी है. पिछले वर्ष जुलाई में हुई बैठक में संयुक्त परियोजना कार्यालय को सौंपा गया कार्य पूरा नहीं होने के कारण इसके कार्यकाल को बढ़ाने की अनुशंसा कीगयी. संयुक्त परियोजना कार्यालय द्वारा किये जा रहे कार्यों की निगरानी हर दो महीने पर केंद्रीय जल आयोग के नदी प्रबंधन के सदस्य की अध्यक्षता में संयुक्त विशेषज्ञ दल द्वारा की जा रही है.

बिहार के जल संसाधन विभाग के अभियंता प्रमुख :बाढ़ नियंत्रण एवं जल निकासी: राजेश कुमार ने बाढ़ से पूर्व राज्य सरकार द्वारा की जा रही तैयारी के बारे में बताया कि तटबंध सुरक्षा कार्य सहित कुल 429 परियोजनाओं पर काम जारी है, जिनमें से अधिकांश कार्य पूरा हो चुका है और शेष परियोजनाओं पर भी समय रहते काम पूरा कर लिया जायेगा. उन्होंने बताया कि बिहार में वर्तमान में तटबंध की कुल लंबाई 3790 किलोमीटर है, जिसके कारण 39.96 लाख हेक्टयेर क्षेत्र बाढ़ से सुरक्षित रहता है.

राजेश ने बताया कि बाढ़ अवधि 15 जून से 31 अक्तूबर के दौरान तटबंधों के सुरक्षात्मक कार्य सहित अन्य आवश्यक कार्यों को लेकर मुख्य सचिव और विभागीय प्रधान सचिव के स्तर पर समय समय विभिन्न निर्देश जारी कियेगये हैं तथा तटबंध की सुरक्षा के लिए प्रत्येक एक किलोमीटर पर एक होमगार्ड की तैनाती की जायेगी.

हालांकि, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने बाढ़ से पूर्व तटबंधों की मरम्मत को मात्र खानापूर्ति करार देते हुए आरोप लगाया कि वर्ष 2008 में कोसी नदी में आयी प्रलंयकारी बाढ़ से हुई त्रासदी और विस्थापित लोगों के पुनर्वास की राशि अबतक खर्च नहीं हो पाई है. उन्होंने तटबंधों की मरम्मत के कार्य पर खर्च की जा रही राशि में पूर्व की भांति ‘घोटाला’ किये जाने की आशंका व्यक्त की है.

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