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लालू के जेल जाने के बाद उनकी पार्टी और बिहार की राजनीति पर होगा बड़ा असर, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

Updated at : 23 Dec 2017 5:53 PM (IST)
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लालू के जेल जाने के बाद उनकी पार्टी और बिहार की राजनीति पर होगा बड़ा असर, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

पटना : राजद सुप्रीमो लालू यादव को सीबीआइ की विशेष अदालत ने आज चारा घोटाले में दोषी करार दिया है. उन्हें न्यायायिक हिरासत में होटवार जेल भेज दिया गया है. सीबीआइ कोर्ट तीन जनवरी को लालू को इस मामले में सजा सुनायेगी. लालू के जेल जाते ही एक साथ बहुत सारे सियासी सवाल राष्ट्रीय राजनीति […]

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पटना : राजद सुप्रीमो लालू यादव को सीबीआइ की विशेष अदालत ने आज चारा घोटाले में दोषी करार दिया है. उन्हें न्यायायिक हिरासत में होटवार जेल भेज दिया गया है. सीबीआइ कोर्ट तीन जनवरी को लालू को इस मामले में सजा सुनायेगी. लालू के जेल जाते ही एक साथ बहुत सारे सियासी सवाल राष्ट्रीय राजनीति के साथ बिहार की राजनीति में तैरने लगे हैं. पहला सवाल यह कि क्या अब राष्ट्रीय स्तर पर एंटी एनडीए फ्रंट का अगुवा बनने की कोशिश में जुटे लालू यादव अलग-थलग हो जायेंगे. क्या बिहार में उनकी पार्टी को पूर्व उपमुख्यमंत्री और उनके छोटे बेटे तेजस्वी यादव संभाल पायेंगे. क्या पार्टी के अंसंतुष्ट इस दौरान दूसरी जगह अपना ठिकाना नहीं ढूंढ़ेंगे. यह तमाम सवाल राजनीतिक प्रेक्षकों से लेकर बिहार की राजनीति को नजदीक से देखने वाले नेताओं के दिमाग में चल रही है. लालू को तीन जनवरी को सजा सुनायी जायेगी. उनके जेल जाते ही भले राजद के नेता मीडिया से यह कहते नजर आयें कि तेजस्वी के नेतृत्व में पार्टी बिल्कुल एकजुट है. सवाल उठता है क्या यह सत्य है ?

लगभग बीस वर्षों बाद राजद फिर उसी दोराहे पर खड़ा है. लालू ने राजनीति में भी परिवार को हमेशा सर्वोपरि रखा है. लालू ने इससे पहले भी चारा घोटाला में लालू प्रसाद के जेल जाने की नौबत आने के बाद मुख्यमंत्री का ताज राबड़ी देवी को सौंप दिया था. हालांकि, उस समय भी पार्टी में कई सारे योग्य नेता थे और उन्होंने लालू की राजनीतिक आभा के सामने अपने को नतमस्तक कर लिया. अब वक्त के साथ राजनीति और उसका मिजाज भी बदला है. राजनेताओं में पद को लेकर एक अलग तरह की चेतना आयी है. तेजस्वी यादव ने हाल में लालू के सामने कई बार सार्वजनिक मंच पर अपने राजनीतिक कौशल को साबित किया है, लेकिन यह समझना होगा कि तेजस्वी यादव लालू नहीं बल्कि उनके बेटे हैं. वरिष्ठ पत्रकार और बिहार की राजनीति को नजदीक से समझने वाले प्रमोद दत्त कहते हैं कि पार्टी के अंदर असंतुष्टों को संभालना तेजस्वी के बस की बात नहीं होगी. तेजस्वी और तेज प्रताप पूरी पार्टी और प्रदेश स्तर के नेताओं को संभालने में कामयाब होंगे, यह संभव नहीं दिखता है.
कुछ महीने पूर्व राजद की राजगीर में आयोजित कार्यकारिणी की बैठक में लालू ने मंच से यह कहकर सबको एक संदेश जरूर दे दिया था कि उनकी राजनीतिक विरासत के मुखिया तेजस्वी यादव ही होंगे. पार्टी के अंदर उसके बाद से ही चर्चाओं का दौर शुरू हुआ, लेकिन लालू के निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के बाद उस पर विराम लग गया. उस बैठक के बाद से तेजस्वी ने कई जगहों का अकेले दौरा किया और फ्रंट फूट पर आकर मीडिया में बयान देने लगे और विरोधियों से अपना बचाव करने भी लगे. सियासी जानकार मानते हैं कि विरोधियों से लड़ने के लिए सिर्फ इतना भर ही काफी नहीं है, इसके लिए तेजस्वी यादव को लालू यादव की तरह अक्रामक राजनीति करनी होगी और इस तरह की राजनीति के लिए जातिगत समीकरणों के अलावा राष्ट्रीय मुद्दों पर कुछ बोलने में भी माहिर होना जरूरी है.

अब राजद के अलावा बिहार के बाकी राजनीतिक दलों की निगाहें लालू परिवार पर टिकी रहेंगी. खासकर बड़ी बेटी मीसा भारती, तेजस्वी यादव और तेज प्रताप की ओर पूरी पार्टी आशा भरी निगाहों से देखेगी. कुछ लोगों का मानना है कि लालू के पास आज भी उनके चाहने वालों की एक खास जमात है, जो इस घड़ी में तेजस्वी और तेज प्रताप के साथ डंटकर खड़ी रहेगी. साथ ही, लोग तेजस्वी यादव की काबिलियत भी परखेंगे, क्योंकि पहली बार पार्टी की कमान बिना लालू के तेजस्वी के हाथों में होगी. अंदर के सूत्र बताते हैं कि पार्टी के अंदर वह नेता तेजस्वी और तेज प्रताप के लिए समस्या खड़ी कर सकते हैं, जो राबड़ी देवी के जमाने से अपने-आपको दरकिनार समझते हैं. अंतिम बार 2013 में जेल जाते वक्त लालू की स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी, लेकिन इस बार उनकी पार्टी बिहार की सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए विरोधियों की निगाहें, पार्टी तोड़ने पर भी टिकी रहेंगी.

लालू ने हमेशा सर्वहारा की राजनीति करने की बात कही, वह दलितों और वंचितों का आवाज बनने की बात करते रहे, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उन्होंने कांग्रेस को हमेशा अपने पाले में रखा. गुजरात में अच्छी सीटें आने के बाद कांग्रेस का मनोबल ऊंचा है. कांग्रेस अब बिल्कुल झुक कर लालू के साथ नहीं रहेगी. वहीं दूसरी ओर लालू केंद्रीय राजनीति में अपने को एंटी एनडीए फ्रंट का अगुवा मानते रहे हैं. वैसे में उनके जेल जाने से केंद्र के खिलाफ बनने वाले एक गठबंधन को तगड़ा झटका लग सकता है. राजनीति जानकार मानते हैं कि केंद्र में बनने वाले फ्रंट को एकजुट करने की जो ताकत लालू के पास थी, वह तेजस्वी के पास कतई नहीं है, इस तरह लालू के जेल जाने का बड़ा प्रभाव बिहार के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा.

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