अनुपम कुमारी
पटना : खुद की पहचान की लड़ाई लड़ रहीं िकन्नर (ट्रांसजेंडर) अब चेंजमेकर की भूमिका निभा रही हैं. शहर में कई िकन्नर हैं, िजन्होंने पहले तो खुद की पहचान बनायी और अब ये समाज की अन्य महिलाओं को जागरूक कर रही हैं. चाहे मुद्दा उनके स्वास्थ्य का हो या फिर शिक्षा का, वे समाज की महिलाओं को इसके प्रति जागरूक कर रही हैं.
34 हजार एचआईवी पॉजिटिव महिलाओं के साथ कर रहीं काम : िकन्नर अमृता अल्पस सोनी एचआईवी पॉजिटिव के प्रति महिलाओं को जागरूक कर रही हैं. वह नेशनल एड्स सोसाइटी के साथ मिल कर काम राज्य के 38 जिलों में काम कर रही हैं.
अमृता महाराष्ट्र से हैं, पर काफी लंबे समय से बिहार मेें रह रही हैं. वह खुद भी एचआईवी पॉजिटिव हैं. अमृता की लड़ाई उनके घर व अपनों से शुरू होकर समाज की महिलाओं के बीच पहुंच गयी हैं. िकन्नर के रूप में वह अब एचआईवी पॉजिटिव महिलाआें की जिंदगी को संवारने में लगी हैं. अब तक उन्होंने पूरे बिहार भर में 34 हजार एचअाईवी पॉजिटिव महिलाआें के बीच अपनी पहुंच बना ली है. हाल में उन्हें नेशनल एड्स सोसाइटी ने सम्मानित भी किया है. वह वर्तमान में 14 जिलों में कार्यकर्ताओं के साथ काम कर रही हैं.
प्रत्येक जिला दूसरे नजदीक के जिले को कवर करता है. वह बताती हैं कि हाल के दिनों में गोपालगंज के प्राथमिक विद्यालय की रसोइये को एचअाईवी पॉजिटिव होने पर काम से निकाल दिया गया था. ऐसे में अमृता ने वहां के डीएम के साथ मिलकर रसोइये को न्याय दिलाया. वहीं ग्रामीण इलाकाें में पहुंच कर वह लोगों को एचआईवी पॉजिटिव के प्रति जागरूक कर रही हैं. उनके साथ बिहार की किन्नर डिंपल जैसमिन और अनुप्रिया भी मिलकर काम कर रही हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने तीसरे लिंग के रूप में दी है मान्यता
2014 के अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने किन्नर (ट्रांसजेंडर) को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी थी. इसके बावजूद किन्नर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं. कभी शौचालय के रूप में तो कभी आधार और पैन कार्ड, तो कभी बिहार सरकार द्वारा गठित किया जाने वाल कल्याण बोर्ड के रूप में. पूरे बिहार भर में किन्नरों की आबादी 40 हजार है. इनमें पटना जिले में करीब 2500 किन्नर हैं. इनमें 44% शिक्षित और 66% अशिक्षित हैं.
शिक्षा से ही समाज का होगा विकास
पटना विश्वविद्यालय से एमएसडब्ल्यू की पढ़ाई कर रहीं वीरा यादव भी अब समाज में लोगों को शिक्षित करने का संदेश दे रही हैं. वह पाटलिपुत्र स्थित नेहरू नगर में रह रहे गरीब बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देने के साथ ही समाज की लड़कियों को शिक्षित करने के लिए लोगों को जागरूक कर रही हैं.
मोनिका दास कंकड़बाग स्थित सिंडिकेट ब्रांच में काम कर रही हैं. खुद की पहचान बनाने के बाद अब वह िकन्नर समुदाय के बीच रोल मॉडल बन चुकी हैं. वह अन्य महिलाअों को खुद की पहचान बनाने के लिए शिक्षा के प्रति लाेगों को जागरूक कर रही हैं. दोनों के प्रयासों से सैकड़ों महिलाएं अब तक िशक्षा से जुड़ चुकी हैं.
