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सस्पेंड थानेदार और SDPO से फिर पूछताछ करेगी CBI, मोबाइल फॉरेंसिक में देरी पर उठे सवाल

Updated at : 09 Mar 2026 9:32 AM (IST)
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NEET Student Death Case

सांकेतिक तस्वीर

NEET Student Death Case: पटना के बहुचर्चित नीट छात्रा मामले में जांच फिर तेज हो गई है. छात्रा के मोबाइल फोन को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजने में हुई देरी की गुत्थी अब तक नहीं सुलझी है. इसी वजह से सीबीआई एक बार फिर निलंबित थानेदार रोशनी कुमारी और संबंधित एसडीपीओ अनु कुमारी से पूछताछ की तैयारी कर रही है.

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NEET Student Death Case: बिहार के बहुचर्चित नीट (NEET) छात्रा मामले में जांच की आंच अब पुलिस महकमे के उन आला अधिकारियों तक पहुंच गई है, जिन पर साक्ष्यों के साथ लापरवाही बरतने का आरोप है. केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) इस मामले में सस्पेंड थानेदार रोशनी कुमारी और अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी (SDPO) अनु कुमारी से एक बार फिर कड़ी पूछताछ करने की तैयारी में है.

जांच एजेंसी के पास अब कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब पहले दौर की पूछताछ में नहीं मिल सका था.

मोबाइल फॉरेंसिक जांच में देरी बना बड़ा सवाल

जांच एजेंसी के सामने सबसे बड़ा सवाल छात्रा के मोबाइल फोन को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजने में हुई देरी को लेकर है. शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि मोबाइल को तकनीकी जांच के लिए भेजने की प्रक्रिया में तेजी नहीं दिखाई गई.

मोबाइल कब जब्त किया गया, कितने समय तक किसकी कस्टडी में रहा और आखिर उसे जांच के लिए कब भेजा गया. इन सभी पहलुओं को लेकर अभी भी स्पष्टता नहीं है.

CBI समझना चाहती है पूरी टाइमलाइन

सीबीआई अब पूरी टाइमलाइन को स्पष्ट करना चाहती है. इसी वजह से निलंबित थानेदार रोशनी कुमारी और एसडीपीओ अनु कुमारी से दोबारा पूछताछ की तैयारी की जा रही है. जांच एजेंसी मोबाइल की कस्टडी चेन, केस डायरी में दर्ज विवरण और संबंधित दस्तावेजों का मिलान कर रही है, ताकि घटनाक्रम की सही तस्वीर सामने आ सके.

जांच का एक अहम पहलू यह भी है कि मोबाइल को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजने में हुई देरी महज प्रशासनिक लापरवाही थी या इसके पीछे किसी स्तर पर जानबूझकर विलंब किया गया.

डिजिटल साक्ष्य से खुल सकती है सच्चाई

जांच एजेंसी का मानना है कि मोबाइल से मिलने वाले डेटा ही पूरी सच्चाई को सामने ला सकते हैं. फिलहाल, अधिकारियों की प्रारंभिक कार्रवाई और दस्तावेजों के मिलान की प्रक्रिया जारी है.

इस देरी के पीछे किसी भी स्तर पर जानबूझकर किया गया विलंब साबित होता है, तो यह मामला केवल लापरवाही का नहीं बल्कि ‘साक्ष्य मिटाने’ की गंभीर धारा की ओर मुड़ सकता है.

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Pratyush Prashant

लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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