नवादा: आधुनिकीकरण के दौर में भी प्रासंगिक है हल-बैल से खेती, छोटे खेतों के लिए वरदान और सेहत के लिए फायदेमंद

Author Vishal kumar|Edited by Vikash Jha
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 खेत में हल चलाता किसान   | Prabhat Khabar Network

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आधुनिकीकरण के इस दौर में भी नवादा के किसान हल-बैल से खेती की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। जानें क्यों यह छोटे खेतों के लिए वरदान और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए उत्तम है।

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Nawada News: नवादा जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि तकनीक में तेजी से बदलाव आ रहा है. आधुनिक उपकरणों और ट्रैक्टरों के आने से किसान कम समय में अधिक लाभ कमाने के लिए अपने पारंपरिक तरीकों को तेजी से त्याग रहे हैं. लेकिन इस आधुनिकीकरण के बीच सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि ट्रैक्टर से खेती बढ़ने के कारण दूध न देने वाले मवेशियों को खुले में छोड़ दिया जा रहा है, जो अब खुद किसानों के लिए 'आवारा पशु' के रूप में एक बड़ी समस्या बन गए हैं. इस मशीनी युग और बढ़ती लागत के बीच, क्षेत्र के कई छोटे व पारंपरिक किसान आज भी हल-बैल से खेती करने की समृद्ध परंपरा को जीवित रखे हुए हैं.

शारीरिक स्वास्थ्य और छोटे खेतों के लिए उत्तम

लकड़ी के पारंपरिक हल और बैलों से खेती करने के आज भी अनेक व्यावहारिक और वैज्ञानिक फायदे हैं. हल चलाने से किसानों का कड़ा शारीरिक श्रम होता है, जिससे वे कई बड़ी और आधुनिक बीमारियों से बचे रहते हैं. इसके साथ ही खेतों में निरंतर चलने से बैलों का स्वास्थ्य भी उत्तम रहता है. स्थानीय किसानों का मानना है कि छोटे और संकरे खेतों में बड़े ट्रैक्टरों को मोड़ना और काम करना मुश्किल होता है, जबकि बैलों के माध्यम से छोटे खेतों की जुताई बेहद आसानी और बारीकी से हो जाती है. क्षेत्र के प्रगतिशील किसान सोनू सिंह बताते हैं कि उनके गांव में आज भी अधिकांश लोग बैलों के माध्यम से ही हल चलाना पसंद करते हैं.

मशीनीकरण से मिट्टी पर पड़ रहा है बुरा प्रभाव

ग्राम विसियायत के अनुभवी किसान नवल केशरी ने आधुनिकीकरण और डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि आज लोग शारीरिक परिश्रम से बचना चाहते हैं, यही वजह है कि लोग ट्रैक्टरों के पीछे भाग रहे हैं और मुंशी प्रेमचंद की कहानियों जैसी 'हीरा-मोती की जोड़ी' (बैलों की जोड़ी) को खुद से दूर कर विलुप्त कर रहे हैं. हमारे बड़े-बुजुर्गों का हमेशा से मानना रहा है कि बैलों द्वारा की गई जुताई से मिट्टी की प्राकृतिक उत्पादकता और उसकी नमी बरकरार रहती है, जिससे फसल की गुणवत्ता भी बेहतर होती है.

ट्रैक्टर की जुताई से दलदल बन रहे हैं खेत

किसान नवल केशरी ने मशीनी जुताई के नुकसानों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ट्रैक्टर की भारी बनावट और उसके हल की तीखी नोक के कारण खेत आवश्यकता से अधिक गहरे जुत जाते हैं. इसके लगातार प्रयोग से मानसून के समय खेत दलदल में तब्दील होने लगते हैं, जिससे पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंचता है और फसल वैसी नहीं हो पाती जैसी होनी चाहिए. इन तमाम दोषों और मिट्टी पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों को जानने के बावजूद, आजकल लोग केवल समय की बचत और तात्कालिक सहूलियत के चक्कर में ट्रैक्टरों का अंधाधुंध उपयोग कर रहे हैं. ऐसे में परंपरा को बचाए रखने वाले ये किसान समाज को पर्यावरण और स्वास्थ्य संरक्षण का बड़ा संदेश दे रहे हैं.


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