रजौली की अबरक खदान में अवैध खनन जोरों पर

Updated at : 01 Jun 2017 11:15 AM (IST)
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रजौली की अबरक खदान में अवैध खनन जोरों पर

नक्सलियों की शह पर अवैध खनन का आरोप 1986 से तीन एजेंसियां लीज पर कर रही थीं खनन नवादा : देश भर में राजस्थान के बाद बिहार-झारखंड सीमावर्ती क्षेत्रों में ही अभ्रक की सबसे बड़ी खदान है. नवादा में रजौली की पहाड़ी जंगलों में इस खदान का 80 वर्ग किलोमीटर हिस्सा आता है. इस खदान […]

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नक्सलियों की शह पर अवैध खनन का आरोप

1986 से तीन एजेंसियां लीज पर कर रही थीं खनन

नवादा : देश भर में राजस्थान के बाद बिहार-झारखंड सीमावर्ती क्षेत्रों में ही अभ्रक की सबसे बड़ी खदान है. नवादा में रजौली की पहाड़ी जंगलों में इस खदान का 80 वर्ग किलोमीटर हिस्सा आता है. इस खदान पर नक्सलियों का अवैध कब्जा है. इसके चलते यहां पट्टेधारी अपनी लीज समाप्त होने तक माइका का खनन नहीं कर सके. अब जब लीज समाप्त हो गयी है, तो सुना जा रहा है कि पूर्व के पट्टेधारी दोबारा लीज लेना नहीं चाहते हैं.

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1986 से इस क्षेत्र में तीन पट्टेधारियों को लीज मिली थी.

ये पट्टेधारी बिहार सरकार, शारदा माइंस व छठु राम दर्शन राम थे. लीज की अवधि इस साल मार्च में समाप्त हो गयी. बताया जाता है कि बिहार सरकार को दो हजार एकड़, शारदा माइंस को 500 एकड़ व छठु राम दर्शन राम को सात सौ एकड़ में खनन करने की इजाजत मिली थी. सूत्रों की मानें तो नक्सलियों के कारण इन क्षेत्रों में ये पट्टेदार खनन नहीं कर पाये.

नक्सली व अवैध कारोबारी करा रहे खनन !

इस जंगली क्षेत्र में रहनेवाले गरीब तबके के लोगों से अवैध कारोबारी अभ्रक का ढिबरा चुनने का काम कराते हैं. रुपये के लोग जान जोखिम में डाल कर ढिबरा चुनते हैं. ढिबरा चुनने के दौरान खदान धंसने कई लोगों की अब तक मौत हो गयी है. दूसरी तरफ, नक्सली भी अवैध खनन में लगे हुए हैं.

बताया जाता है कि नक्सलियों का दबदबा होने से लीजधारी भी यहां खनन नहीं कर सके. बताया जाता है कि पूरे जंगली क्षेत्र में नक्सलियों का साम्राज्य कायम है. लेवी मांगे जाने व अवैध कारोबारियों के बीच उनकी सांठ-गांठ से पट्टेधारी खनन करने से पीछे हट गये. नक्सलियों के भय से उनका लीज कागजों तक ही सिमट कर रह गया.

वर्ष 1770 से चल रहा खनन

इस खदान में खनन वर्ष 1770 से ही रहा है. बताया जाता है कि उस वक्त मुगल साम्राज्य था. व जमींदारी प्रथा से खनन कराया जाता था. बताया जाता है कि यहां सिंगर गढ़ स्टेट की जमींदारी थी व वहीं खनन कराता था.

क्या कहते हैं अधिकारी

इन दिनों जिला खनन विभाग में अप्रैल से जिला खनन पदाधिकारी का पद खाली हो चुका है. बावजूद तत्कालीन खनन पदाधिकारी से इस मुद्दे पर बात की गयी. बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि वर्तमान वर्ष 2017 में माइका के तीनों पट्टेधारियों की लीज समाप्त हो चुकी है.

असामाजिक तत्वों के वर्चस्व व नक्सलियों द्वारा लेवी आदि मांगे जाने के चलते पट्टेधारियों का खनन कार्य ठप रहा. परिस्थिति यह हो गयी है कि विभाग को पिछले तीन सालों से एक रुपये का भी राजस्व नहीं मिला है. इससे करोड़ों रुपयों के राजस्व का नुकसान हो रहा है.

मनोज कुमार मिश्रा, जिला खनन पदाधिकारी

वर्ष 1932 में अंगरेजों ने जमाया कब्जा

वर्ष 1932 में जब ब्रिटिश सरकार की नजर इस खदान पर पड़ी. बताया जाता है कि माइका के बारे में अंगरेजों को काफी जानकारी थी. उस वक्त बनरचुआ माइंस को ब्रिटिश हुकूमत ने लीज पर देकर खनन शुरू किया था. लंबे समय तक अंगरेज इन खदानों में खनन कराते रहे.

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