रेवरा आंदोलन की राष्ट्रीय स्तर पर हुई चर्चा

Updated at : 02 Jan 2016 7:08 PM (IST)
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रेवरा आंदोलन की राष्ट्रीय स्तर पर हुई चर्चा

रेवरा आंदोलन की राष्ट्रीय स्तर पर हुई चर्चा कार्यक्रम का विषय था-वुमेन इन इंडियन कल्चर थ्रो द ऐजेजग्वालियर में आयोजित हुआ राष्ट्रीय सम्मेलनफोटो-4प्रतिनिधि, नवादा कार्यालयकर्नाटक के मैसूर में इतिहास पुनर्लेखन व गौरवशाली संस्कृति की रक्षा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर 24-26 दिसंबर तक तीन दिवसीय सेमिनार आयोजित हुआ. इतिहासकारों के इस सम्मेलन में श्रीकृष्ण मेमोरियल […]

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रेवरा आंदोलन की राष्ट्रीय स्तर पर हुई चर्चा कार्यक्रम का विषय था-वुमेन इन इंडियन कल्चर थ्रो द ऐजेजग्वालियर में आयोजित हुआ राष्ट्रीय सम्मेलनफोटो-4प्रतिनिधि, नवादा कार्यालयकर्नाटक के मैसूर में इतिहास पुनर्लेखन व गौरवशाली संस्कृति की रक्षा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर 24-26 दिसंबर तक तीन दिवसीय सेमिनार आयोजित हुआ. इतिहासकारों के इस सम्मेलन में श्रीकृष्ण मेमोरियल कॉलेज के लेक्चरर डॉ अशोक कुमार प्रियदर्शी ने रेवरा आंदोलन में महिलाओं की संघर्षपूर्ण भूमिका पर पक्ष रखा. रेवरा गांव में जमींदारों के अत्याचार से पुरूष जब हार मान गए थे, तब महिलाएं लाठियां उठा ली थी. इसके लिए डॉ प्रियदर्शी को यूनिवर्सिटी ऑफ मैसूर के वीसी प्रो केपी रंगप्पा व अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नयी दिल्ली के अध्यक्ष डॉ सतीश मितल ने प्रमाणपत्र भी दिया. अब दो माह बाद ग्वालियर में होने वाले युवा इतिहासकारों के राष्ट्रीय सम्मेलन में डॉ अशोक प्रियदर्शी बिहार का प्रतिनिधित्व करेंगे. एबीआइएसवाइ के बिहार प्रभारी डॉ राजीव रंजन ने कहा कि बिहार से पांच युवा इतिहासकार इसमें शिरकत करेंगे. डॉ राजीव रंजन के मुताबिक, इतिहास को पुनर्व्याखित करने की जरूरत है. इतिहास पहले जो लिखा गया वह पूर्ण इतिहास नहीं है. यूरोपीय इतिहासकारों ने भारत के मजबूत पक्ष को नजरअंदाज किया है. गौरवशाली संस्कृति की रक्षा की जरूरत है. गौरतलब है कि इस सम्मेलन में कॉलेज ऑफ कॉमर्स के प्रो (डॉ) राजीव रंजन, एसकेएम कॉलेज के डॉ अशोक प्रियदर्शी, नालंदा कॉलेज की प्रो मंजू कुमारी के अलावा इतिहासकार शैलेश कुमार, अरुण कुमार, सत्येन्द्र कुमार आदि प्रतिनिधि शामिल हुए थे. रेवरा आंदोलनरेवरा बिहार के नवादा जिले के काशीचक प्रखंड का एक गांव है. रेवरा में जमींदारों के अत्याचार की कहानी है. स्वामी सहजानंद ने ‘अपनी जीवन संघर्ष’ नामक पुस्तक में इन कहानियों का जिक्र किया है. किसानों के छप्पर पर जब दो कद्दू फलते थे, तो उनमें से एक कद्दू जमींदार का हो जाता था. दो बकरे में एक जमींदार का होता था. गांव के करीब डेढ़ हजार बिगहा जमीन को निलाम करवा लिया गया था. 500-600 व्यक्ति चिथरा पहने भूखों मरते थे. लड़कियां बेचीं जा रही थी. जमींदार उससे भी आधे मूल्य जमींदारी व बकाये लगान में वसूल रहे थे. जुल्म सितम का आलम यह था कि-एक बार गांव वालों से दूध की मांग की गयी थी. जब जमींदार के कारिंदे ने कहा कि गांव में दूध नही है, तब जमींदार ने औरतों को दूह लाने का निर्देश दिया था. जमींदारों के अत्याचार से जब पुरुष हार मान गये थे. तब महिलाएं लाठियां उठा ली थीं. आखिर में जमींदारों को समझौता करना पड़ा था.

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