चरखा बना रहा महिलाओं को आत्मनर्भिर

Updated at : 28 Dec 2015 7:02 PM (IST)
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चरखा बना रहा महिलाओं को आत्मनर्भिर

चरखा बना रहा महिलाओं को आत्मनिर्भर सूत कताई कर कमा रही प्रतिमाह चार से पांच हजार रुपये खादी ग्रामोद्योग समिति सीमित संसाधनों में जुटा रहा रोजगारलड़कियों में भी चरखा चलाने को लेकर देखा जा रहा उत्साहफोटो-13प्रतिनिधि, नवादा (नगर)कभी आजादी की लड़ाई का प्रतीक बना चरखा आज महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन का आधार बन रहा है. […]

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चरखा बना रहा महिलाओं को आत्मनिर्भर सूत कताई कर कमा रही प्रतिमाह चार से पांच हजार रुपये खादी ग्रामोद्योग समिति सीमित संसाधनों में जुटा रहा रोजगारलड़कियों में भी चरखा चलाने को लेकर देखा जा रहा उत्साहफोटो-13प्रतिनिधि, नवादा (नगर)कभी आजादी की लड़ाई का प्रतीक बना चरखा आज महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन का आधार बन रहा है. ग्राम निर्माण मंडल, खादी ग्रामोद्योग सामित द्वारा जिले के कई गांवों में चल रहे सूत कताई सेंटर के माध्यम से चरखा चला कर महिलाएं आय बढ़ा रही है. 20 से 25 महिलाओं की टोली एक जगह इकट्ठा होकर समिति के द्वारा उपलब्ध कराये गये चरखा के माध्यम से सूत काट कर उसका गुंडी बनाती है. इसके एवज में उन्हें मजदूरी उपलब्ध कराया जाता है. महिलाओं को रोजगार का माध्यम उपलब्ध कराकर उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनने में खादी ग्रामोद्योग समिति अपनी भूमिका निभा रही है. औसतन ढाई सौ से तीन सौ किलो प्रतिमाह धागा का उत्पादन इन छोटे से सूत कताई सेंटरों के माध्यम से होता है. सूत काटने वाली महिलाओं को लगभग साढे पांच सौ रुपये प्रतिकिलो सूत कताई के रूप में दिया जाता है. त्रिपुरारि मॉडल चरचा का सहयोग ग्राम निर्माण मंडल खादी ग्रामोद्योग समिति गांव की महिलाओं को चरखा चलाने का प्रशिक्षण देकर उन्हें चरखा व कच्चा माल पुनी के रूप में उपलब्ध कराता है. गांव की महिलाएं चरखा के माध्यम से उसे 40 से 50 अंक तक के महीन सूत में बदल कर इसे गुंडी के रूप में दुबारा समिति को वापस करती है. इसके बदले में उन्हें मेहनताना दिया जाता है. जिले के रोह प्रखंड के रतोई ग्राम में चल रहे सूत कताई सेंटर से 15 से 20 महिलाएं जुड़ी हुई है. हाथ से चलने वाले त्रिपुरारि मॉडल अंबर चरखा द्वारा यह महिलाएं एक जगह पर इकट्ठा होकर सूत काटने का काम कर रही है. इससे न के केवल इन परिवारों को आर्थिक लाभ हो रहा है. बल्कि, गांव में महिलाओं की समस्यों से जुड़ी बातों पर भी ये लोग समय-समय पर अपनी चिंता व प्रक्रिया व्यक्त करते हैं. गांव में विकास के लिए क्या कार्य हो इनमें भी समिति से जुड़ी महिलाओं की बेेबाक टिप्पनी सुनने को मिलती है. अंबर पुनी से सूत होता है तैयारसूत कताई सेंटर की महिलाओं को समिति द्वारा अंबर पुनी कच्चा माल के रूप में उपलब्ध कराया जाता है. जरूरत के मुताबिक दो से चार अंक तक का पुनी महिलाओं को दिया जाता है. इस पुनी को चरखे से काट कर महिलाएं कपड़े की जरूरत के हिसाब से 40 से 60 अंक तक का महीन धागा तैयार करती हैं. एक हजार मीटर के धागे से एक गुंडी तैयार किया जाता है. 40 से 50 अंक वाले 32 से 34 गुंडी एक किलो वजन का हो जाता है. इसकी मजदूरी के रूप में महिलाओं को दो सौ से ढाई सौ रुपये मिलते है. सामान्यत: महिलाएं तीन से चार हजार रुपये की कमाई कर लेते हैं. इसके अलावा महिलाओं को समिति के कल्याण कोष, अनुग्रह कोष आदि से भी कमीशन के रूप में रुपये मिलते हैं. जिनसे इन्हें वर्ष में एक या दो बार खादी भंडार के बिक्री केंद्रों से कपड़ा खरीदने की राशि मिलती है. मिल रहा बहुत कुछ सीखने को चरखा सीखने को लेकर नये लड़कियों में भी उत्साह देखने को मिलता है. रतोई गांव में मां के साथ काम करने के लिए घर के लड़कियां भी काफी संख्या में देखी गयी. निशी, निधि, सोनाली, जूली जैसी लड़कियां मां की अनुपस्थिति में उनके जगह चरखा चला रही थी. उन्होंने कहा कि चरखा चलाने से आमदनी तो होती ही है. समय भी अच्छा से कट जाता है. यहां एक साथ कई गांव की महिलाएं इकट्ठा होती हैं. इससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है. पढ़ाई से कुछ समय निकाल कर चरखा चलाने में मां का हाथ बंटाते है. गांव में स्कूल व कॉलेज की लड़कियों में चरखा से सूत कातने का क्रेज दिखा. बेहतर सुविधा देने की जरूरतसूत कताई सेंटर अभाव की हालत में संचालित किया जा रहा है. इन सेंटरों को विशेष मदद देने की जरूरत है. रोह प्रखंड के रतोई गांव में चल रहे सूत कताई सेंटर के पास अपना भवन नहीं है. फिलहाल यह गांव के नवयुवक क्लब के भवन में चलाया जा रहा है. साल में एक माह क्लब द्वारा नाटक व अन्य प्रकार का आयोजन किया जाता है. इस समय सेंटर को बंद करना पड़ता है. सेंटर के पास जगह की कमी है. इसके कारण केवल 13 चरखें ही इस सेंटर में संचालित हो रहे हैं. यदि सरकार पास के गैरमजरूआ जमीन पर खादी ग्रामोद्योग समिति द्वारा एक बड़ा भवन बनवा देती है, तो गांव की और अधिक महिलाओं चरखा चलाने के काम से जुड़ सकेगी. गांव की आबादी के अनुरूप काफी कम महिलाओं संस्थान से जुड़ी हुई है. जबकि, ऐसी सैकड़ों महिलाएं उस गांव में हैं, जो सूत कताई सेंटर से जुड़ कर आर्थिक रूप से परिवार की मदद करना चाहती है. जिले में चल रहे सेंटर जिले में रोह प्रखंड के रतोई गांव के अलावा सिंघना, वारिसलीगंज के कोशला, लाल बिगहा, कौआकोल के सोखोदेवरा आश्रम, बिरहोर टांड़, झीलार, नदिया पर, कपसिया, काशीचक प्रखंड मुख्यालय, नरहट के खनवां आदि गांवों में खादी ग्रामोद्योग द्वारा सूत कताई सेंटर चलाया जा रहा है. जहां महिलाएं चरखा चला कर घर की आर्थिक स्थिति सुधारने में अपनी भूमिका निभा रही है. किसी भी गांव में सूत कताई सेंटर बनाने के लिए गांव के 25 से अधिक महिलाओं का दल बनानी होती है. जिसे खादी ग्रामोद्योग पटना से अनुमति मिलने के बाद चरखा व सूत उपलब्ध करा कर चरखा से सूत कताई सेंटर शुरू किया जाता है.डिमांड के अनुसार काम खादी को बढ़ावा देने के लिए हर संभव प्रयास किया जा रहा है. डिमांड के अनुसार महिलाओं को रोजगार देकर उनसे सूत काटने का काम कराया जाता है. संसाधन का अभाव है, बावजूद महिलाओं को काम देकर सूत काटने का काम जिला के कई केंद्रों पर किया जा रहा है. जय नारायण प्रसाद, प्रबंधक, ग्राम निर्माण मंडल, खादी ग्रामोद्योग समितिधागों के वजन के अनुसार मजदूरी रोह प्रखंड के रतोई, सिंघना गांव में सूत कताई सेंटर काम कर रहा है. यहां से उत्पादित सूत मील में भेजा जाता है. जहां इन धागों से कपड़े बुने जाते है. संस्था की महिलाओं को उनके द्वारा बनाये गये धागों के वजन के अनुसार मजदूरी दिया जाता है. सामान्यत: तीन से चार हजार रुपये प्रतिमाह महिलाएं कमा लेती है. अलखदेव सिंह, उपकेंद्र व्यवस्थापकबोलीं महिलाएंगांव में चरखा सेंटर की शुरुआत होने से लोगों को काफी लाभ मिल रहा है. महिलाएं भी अब घर के कामों में मदद कर पाती है. बेकार में घर में बैठी रहनेवाली महिलाएं मेहनत कर देश के लिए कुछ कर पा रही है. उर्मिला देवीचरखा के लिए समय पर कच्चा माल मिल जाता है. हिसाब-किताब भी सही से होता है. गांव में एक साथ बैठ कर हम लोग सूत बनाते हैं. लेकिन, अपना भवन नहीं होने के कारण काफी परेशानी होती है. तारा देवीगांव में सैकड़ों महिलाएं चरखा सेंटर से जुड़ना चाहती हैं, लेकिन गांव में केवल 13 चरखें ही है. यदि चरखों की संख्या बढ़ायी जाये तो परिवार के और सदस्यों को काम मिल सकता है. मालती देवीसूत कताई सेंटर नवयुवक क्लब के भवन में चल रहा है. जहां नाटक के समय लगभग एक माह तक भवन को खाली करना पड़ता है. बरसात में जगह की कमी के कारण सूत काटने में काफी परेशानी होती है. रीता देवीमां की जगह पर कभी-कभी सेंटर पर सूत काटने आते है. सूत काटने के लिए सीखना आसान है. यदि थोड़ी सी ट्रेनिंग मिल जाय तो कोई भी लड़की सूत काट सकती है. इससे पॉकेट खर्च भी निकल जाता है. निशी कुमारीखादी के कपड़ों को बढ़ावा देने की जरूरत है. जितने लोग खादी कपड़े को पहनेंगे उतना ही अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा. परिवार के सदस्य के नाते चरखा चलाने आते है. यहां बहुत मजा आता है. सोनाली कुमारी

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