हिंदू धर्म नहीं, जीवन जीने की व्यवस्था

Published at :07 Jun 2015 10:29 AM (IST)
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हिंदू धर्म नहीं, जीवन जीने की व्यवस्था

नवादा (नगर): पुरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज का शनिवार को नवादा पहुंचने पर भव्य स्वागत किया गया. बाइक व वाहनों के काफिले के साथ शंकराचार्य को रिसीव कर शहर के जीवन ज्योति पब्लिक स्कूल, पटवासराय ले जाया गया. यहां वह छात्र-छात्राओं के साथ अनौपचारिक बातचीत किये व बच्चों ने उनसे कई सवाल […]

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नवादा (नगर): पुरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज का शनिवार को नवादा पहुंचने पर भव्य स्वागत किया गया. बाइक व वाहनों के काफिले के साथ शंकराचार्य को रिसीव कर शहर के जीवन ज्योति पब्लिक स्कूल, पटवासराय ले जाया गया. यहां वह छात्र-छात्राओं के साथ अनौपचारिक बातचीत किये व बच्चों ने उनसे कई सवाल भी पूछे. छात्र विकास कुमार ने पूछा कि हिंदू धर्म व सनातन धर्म में क्या अंतर है? शंकराचार्य ने जवाब दिया कि हिंदू एक व्यवस्था पद्धति का नाम है, जबकि हम सभी सनातन धर्म के मानने वाले हैं.

हिंदू धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की व्यवस्था का नाम है. उन्होंने कहा कि जीवन में सनातन धर्म ही ऐसा है, जो अस्तित्व व आदर्श की रक्षा करते हुए अन्य सभी के हितों का ध्यान रखते हैं. देश की सुरक्षा व अखंडता के लिए सबको शक्ति समवेत कर काम करना होगा. स्कूल की छात्र प्रियंका, आराध्या, अंकुर आदि ने भी धर्म व संस्कृति से जुड़े प्रश्नों पर शंकराचार्य के विचारों को जाना. शंकराचार्य ने कहा कि हिंदू धर्म सभी को साथ लेकर चलने की व्यवस्था है़ सनातन धर्म शास्त्रीय सिद्धांतों से जुड़ा है. उन्होंने राष्ट्र रक्षा के लिए बच्चों को प्रेरित किया.

मृत्युंजय बनने की सबकी इच्छा
मृत्यु के भय से मृत्युंजय बनने की इच्छा हर कोई रखता है. लेकिन, धरती पर अमरत्व पाने का कोई विकल्प नहीं है. कई वेदों में यह लिखित है कि भगवान ब्रह्ना को भी मृत्यु का भय रहता है. हमारी-आपकी यह भी चाहत होती है कि हम परमात्मा के सच्चे स्वरूप का दर्शन करें. लेकिन, यह उसी प्रकार है जैसे प्यासे को तृप्त करने वाला पानी स्वयं बोले की उसे भी प्यास लगी है. जैसे पानी की प्यास कोई नहीं बुझ सकता. उसी प्रकार जब सभी मनुष्यों में भगवान व्याप्त हैं, तो फिर दर्शन देने की क्या जरूरत है. उन्होंने धर्मातरण पर संकेत करते हुए कहा कि 1972 में श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य जो स्वयं वेदों व पुरानों के प्रकांड विद्वान थे उन्होंने कहा था कि मैं आज भी सात से आठ घंटे वेदों पुरानों का अध्ययन करता हूं. इसका कारण है एक बार एक चर्च के पादरी ने चर्चा के क्रम में धर्म परिवर्तन का आग्रह किया था. तब उन्होंने कहा था कि जब उनके जैसे विद्वान को कोई इस तरह का प्रलोभन दे सकता है, तो समान्य लोगों का धरमतरण करना कितना आसान हो सकता है. इस लिए जरूरी है कि लोग अधिक से अधिक वेदों व ग्रंथों का उध्ययन करें.
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