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कारगिल विजय दिवस : जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी

Updated at : 26 Jul 2019 7:25 AM (IST)
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कारगिल विजय दिवस : जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी

26 जुलाई, 1999 का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है. इसी दिन कारगिल चोटी को भारतीय सेना के जांबाजों ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़कर मुक्त करायाथा. शुक्रवार को कारगिल विजय दिवस की 20वीं वर्षगांठ है. कारगिल में शहीद हुए वीर सैनिकों में बिहार के भी कई जवान शामिल थे, जिन्होंने अपनी जान […]

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26 जुलाई, 1999 का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है. इसी दिन कारगिल चोटी को भारतीय सेना के जांबाजों ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़कर मुक्त करायाथा. शुक्रवार को कारगिल विजय दिवस की 20वीं वर्षगांठ है. कारगिल में शहीद हुए वीर सैनिकों में बिहार के भी कई जवान शामिल थे, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा की थी. बिहार के सीवान, नालंदा, सारण, वैशाली, भोजपुर समेत अन्य जिलों से शहीद जवान के परिजनों को आज भी इनकी शहादत पर गर्व है.

शहीद हरदेव के नाम पर नहीं बने स्कूल व सड़क

एकंगरसराय (नालंदा) : कुकुरबर गांव के लोगों का आज भी फक्र से सीना चौड़ा है. भले ही कुकुरबर गांव कारगिल युद्ध में अपना बेटा खोया हो, लेकिन कुकुरबर गांव कारगिल विजय दिवस के कारण जाना जाने लगा है. यह वही कुकुरबर गांव है, जहां के हरदेव प्रसाद ने कारगिल युद्ध में दुश्मनों से लोहा लेते शहीद हो गये थे. भले ही सरकार अपने सारे वायदे भूल गयी हो, लेकिन यहां के लोग शहीद हरदेव को कभी नहीं भूलेंगे.

हालांकि शहीद हरदेव का परिवार अब यहां नहीं रहता है. उनकी पत्नी मुन्नी देवी एकंगरसराय अस्पताल में सरकारी पद पर कार्यरत हैं और उनके बच्चे बाहर पढ़ रहे हैं. शहीद हरदेव प्रसाद भारत की रक्षा के लिये कारगिल युद्ध के दौरान 12 जून 1999 को पाकिस्तानी सैनिकों से लोहा लेते हुए अपनी जान भारत मां के चरणों में न्योछावर कर दिया था. वे एकंगरसराय के कुकुरबर गांव के रहने वाले थे.

शहीद हरदेव वर्ष 1988 में बिहार रेजिमेंट प्रथम बटालियन में नियुक्त होने के बाद आसाम, दिल्ली के अलावा विदेशों में भूटान और सोमालिया में शांति सैनिक के रूप में काम किया था. वर्ष 1994 में सोमालिया युद्ध में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिये पुरस्कृत और सम्मानित भी किया गया था. गांव के लोग कारगिल युद्ध की यादें ताजा करते हुए उनकी आंखों में आंसू छलक जाते हैं, लेकिन फिर गर्व से कहते हैं कि शहीद कभी मरते नहीं, बल्कि देश व समाज के प्रेरणास्त्रोत होते हैं.

उनके जीवन से देश के नौजवानों को प्रेरणा मिलती है. गांव वालों को इस बात का बहुत अफसोस है कि शहीद हरदेव का गांव में उनके शहीद होने के बाद की गयी सरकारी घोषणाएं सिर्फ हवाबाजी रह गयी. शहीद हरदेव के नाम से तो विद्यालय बना, न तो स्वास्थ्य उपकेन्द्र, न तो सड़क और न ही प्रखंड मुख्यालय चौराहा पर आदमकद प्रतिमा ही स्थापित हुई. सरकारी घोषणाओं के मुताबिक कुकुरबर गांव आज भी आदर्श गांव में परिणत नहीं हो सका है.

रामगढ़वा : आज भी शहीद के गांव को सड़क का इंतजार

प्रखंड क्षेत्र के भटिया निवासी अरविंद कुमार पांडेय बिहार रेजिमेंट प्रथम बटालियन में जवान थे. कारगिल युद्ध के दौरान द्रास के टोलोलिन की पहाड़ी पर पाकिस्तानी घुसपैठियों से वीरतापूर्वक लड़ते हुए 29 मई, 1999 को वीरगति को प्राप्त किया था. अरविंद कारगिल युद्ध के पहले शहीद सैनिक थे.उस समय बड़े-बड़े राजनेता, मंत्री, पदाधिकारी अरविंद के गांव पहुंचे थे. कहा था कि गांव को मुख्यालय से पक्की सड़क से जोड़ा जायेगा. सभी ग्रामीणों को पक्का का घर मिलेगा. बिजली मिलेगी. इस तरह की कई बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गयी थी.

ईश्वर चंद्र पांडेय व सुनैना देवी के लाल अरविंद को शहीद हुए बीस साल बीत गये. लेकिन, ग्रामीणों को पक्का घर देने की बात कौन कहे आज तक पक्की सड़क नहीं बन पायी है. शहीद अरविंद के सम्मान में बना स्मारक भी अधूरा है. शहीद दिवस पर कोई राजनेता, जनप्रतिनिधि व पदाधिकारियों उनके स्मारक पर पुष्प अर्पित करने भी नहीं आता है.

गोपालपुर : शहीद रतन की चर्चा हर जुबां पर

गांव में हर साल मनता है शहादत दिवस

कारगिल शहीद हवलदार रतन सिंह का परिवार आज भी परेशानी से दो-चार हो रहा है. सरकार द्वारा घोषित जमीन तक परिजनों को नहीं मिल पायी है.

भागलपुर जिले के गोपालपुर प्रखंड के तिरासी गांव में बाबू केदारनाथ सिंह व स्व स्नेहलती देवी के घर पहली संतान के रूप में 15 अप्रैल 1959 को रतन सिंह का जन्म हुआ था. प्राथमिक शिक्षा गांव में तथा मैट्रिक की शिक्षा अपने ननिहाल से प्राप्त करने के बाद 28 फरवरी 79 को बिहार रेजिमेंट केंद्र से बुनियादी प्रशिक्षण प्राप्त कर प्रथम बिहार रेजिमेंट में पदस्थापित किये गये. इस दौरान उन्होंने सोमालिया (युनोसोम दो) में सैनिक कार्रवाई में भाग लेकर अपनी सैन्य क्षमता का परिचय दिया. अपनी सेवाकाल के दौरान मुख्यालय 42 पैदल बिग्रेड व 46 बंगाल बटालियन एन सीसी में भी पदस्थापित रहे.

पाक घुसपैठियों व पाक सैनिकों द्वारा कारगिल के बटालिक प्रक्षेत्र में 16470 फीट की ऊंचाई पर स्थित जुबार टॉप नामक चौकी को वापस प्राप्त करने के लिए प्रथम बिहार की तीन टुकडियों को अहम जिम्मेदारी सौंपी गयी. 29 जून 1999 की आधी रात में अपने कमांडर के नेतृत्त्व में हवलदार रतन सिंह ने जुबार टॉप पर मोर्चा लिया तथा पाक सैनिकों के साथ लड़ाई लड़ते हुए भातृभूमि की रक्षा के लिए दो जुलाई को शहीद हो गये.

ग्रामीण शहीद रतन के गांव में प्रतिवर्ष शहादत दिवस मना कर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, परन्तु वीरगति प्राप्त शहीद की विधवा मीना देवी को अभी तक पांच कट्ठा जमीन पर बिहार सरकार के अधिकारी कब्जा नहीं दिला सके हैं, जबकि शहीद की विधवा पत्नी सरकार द्वारा प्राप्त जमीन की मालगुजारी सरकार को दे रही हैं. जमीन पर कब्जा दिलाने के लिए उन्होंने दर्जनों बार सरकारी हाकिमों के दरवाजे खटखटाये हैं. रतन सिंह के पुत्र रूपेश कुमार सिंह शिक्षक हैं और अपने विद्यालय के बच्चों को ही देशभक्ति की भावना का अलख जगा रहे हैं.

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