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ब्रह्ममुहूर्त में शंख ध्वनि से श्री विष्णु को जगाया, गन्ने का मंडप सजाकर तुलसी-शालिग्राम का विवाह

Updated at : 12 Nov 2024 8:08 PM (IST)
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ब्रह्ममुहूर्त में शंख ध्वनि से श्री विष्णु को जगाया, गन्ने का मंडप सजाकर तुलसी-शालिग्राम का विवाह

देवउठनी (देवोत्थान) एकादशी पर ब्रह्ममुहूर्त में भगवान विष्णु को योगनिद्रा से जगाया गया.

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उपमुख्य संवाददाता, मुजफ्फरपुर

देवउठनी (देवोत्थान) एकादशी पर ब्रह्ममुहूर्त में भगवान विष्णु को योगनिद्रा से जगाया गया. मंत्रोच्चार के बीच भगवान का अभिषेक-पूजन कर भोग लगाया गया. मंदिरों में सुबह से शाम तक उत्सव मना. शाम को घरों व मंदिरों में रंगोली बनाई. गन्ने का मंडप सजाकर तुलसी-शालिग्राम का विवाह किया गया. पूजा के लिए गरीबनाथ मंदिर में सबसे अधिक भक्त पहुंचे. यहां सुबह से शाम तक करीब 200 परिवारों ने सत्यनारायण भगवान की पूजा करायी. मंदिर के दोनों ऊपरी तल सत्यनारायण भगवान की पूजा के लिए भरे हुए थे. यहां ग्रामीण क्षेत्रों से काफी लोग पूजा के लिए आये थे. सुबह में भक्तों ने जलाभिषेक किया. अन्य मंदिरों में सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक भीड़ रही. गरीबनाथ मंदिर के पुजारी पं विनय पाठक ने कहा, दिन भर भक्तों का तांता लगा रहा. मंदिर में भी भगवान विष्णु का षोड्शोपचार पूजन कर आरती की गयी और प्रसाद बटा.

जग गये भगवान विष्णु, मांगलिक कार्य शुरू

मान्यता के अनुसार देवोत्थान एकादशी के दिन ही भगवान चार महीने के विश्राम के बाद जगते हैं. इनके जगने के साथ ही मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है. विवाह सहित गृह प्रवेश, उपनयन व नामकरण के लिए शुभ मुहूर्त की शुरुआत हो गयी. देवोत्थान एकादशी के साथ लोगों ने घरों में शालिग्राम तुलसी विवाह भी किया. पुराणों में शालिग्राम को ब्रह्माण्डभूत श्री नारायण का प्रतीक माना जाता है. प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी को श्रद्धालु पूरे विधान से तुलसी व शालिग्राम का विवाह संपन्न कराते हैं. पद्मपुराण के अनुसार जो व्यक्ति शालिग्राम शिला का दर्शन करता है, उसके सामने मस्तक झुकाता है, वह कई यज्ञों के समान पुण्य व गोदान का फल पाता है. इनके स्मरण, कीर्तन, ध्यान, पूजन व प्रणाम करने पर अनेक पाप दूर हो जाते हैं.

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