एइएस का कहर. छीन लिया सवा तीन साल की अंजलि का बचपन

मुजफ्फरपुर: गोपालपुर गांव में घर के पास खेत में खेलती अंजलि. कभी डंडा लेकर मां की ओर दौड़ती है, तो कभी अपनी दादा-दादी को मारने के लिए ईंट का टुकड़ा उठा लेती है. सवा तीन साल की अंजलि में ये बदलाव मुजफ्फरपुर में अभिशाप बन चुकी एक्यूट इंकेफलाइटिस सिंड्रोम (एइएस) से पीड़ित होने के बाद […]
मुजफ्फरपुर: गोपालपुर गांव में घर के पास खेत में खेलती अंजलि. कभी डंडा लेकर मां की ओर दौड़ती है, तो कभी अपनी दादा-दादी को मारने के लिए ईंट का टुकड़ा उठा लेती है. सवा तीन साल की अंजलि में ये बदलाव मुजफ्फरपुर में अभिशाप बन चुकी एक्यूट इंकेफलाइटिस सिंड्रोम (एइएस) से पीड़ित होने के बाद आया है. मां किरण बताती है, चैती छठ के पारन के दिन अंजलि के तेज बुखार आया था, देह अकड़ने लगी थी.
उसी के बाद से उसकी स्थिति खराब होने लगी. बच्ची बेहोश हो गयी थी. इलाज के बाद कुछ ठीक हुई, लेकिन इसके बाद फिर से हालत बिगड़ने लगी. पहले निजी डॉक्टरों से इलाज कराया, लेकिन फायदा नहीं हुआ, तो केजरीवाल अस्पताल में भर्ती कराया गया. वहां तीन दिनों तक अंजलि की इलाज हुआ, जब हालत नहीं सुधरी, तो 11 अप्रैल को एसकेएमसीएच में अंजलि को इलाज के लिए ले जाया गया, जहां उसे एइएस होने की पुष्टि हुई थी. अंजलि को बुखार आता था और वह उसका हाथ-पांव अकड़ने लगता था. इसके बाद वो बेहोश हो जाती थी.
एसकेएमसीएच में अंजलि का लगभग पंद्रह दिन तक इलाज हुआ. इस दौरान उसका सीटी स्कैन भी किया गया, लेकिन अस्पताल के कर्मचारियों का व्यवहार अंजलि के परिजनों के प्रति अच्छा नहीं था. उसके पिता गोनौर व मां किरण दोनों कहते हैं, नर्स दीदी बहुत डांटती थीं. 24 अप्रैल को सुबह अचानक कहा गया, आप अपनी बच्ची को घर ले जाइये. अस्पताल से कोई परचा या दवाइ तक नहीं दी गयी. गुनौर व किरण ने पूछा, तो कुछ नहीं कहा गया, केवल यही कहा गया. आपका बच्च ठीक हो गया है, इसे लेकर घर जाइये.
अंजलि की मां किरण कहती हैं, बच्ची को लेकर हम घर आये, तब यहां पहले जैसी हालत हो गयी. बेहोश हो गयी. इसके बाद हम लोग अंजलि को झाड़-फूंक के लिए लेकर मीनापुर के सिवाईपट्टी गये, जहां ओझा ने 24 घंटे तक झाड़-फूंक की, लेकिन उससे भी अंजलि की स्थिति नहीं ठीक हुई. ओझा ने एक हजार रुपये ले लिये. बच्ची की हालत ठीक नहीं हुई, इस वजह से हम लोग इसे इलाज के लिए लेकर फिर से मुजफ्फरपुर गये, जहां डॉक्टर राम गोपाल जैन को दिखाया गया, लेकिन वहां छह हजार रुपयों की मांग की गयी.
पैसे नहीं होने के कारण हम फिर मेडिकल गये, दो दिन तक बच्ची को रखा गया, इसके बाद फिर से छुट्टी दे दी गयी, लेकिन अंजलि का हालत में सुधार नहीं हुआ. इसके बाद हम देवरिया में डॉक्टर दीपक कुमार जैन के पास गये, जहां का इलाज अभी तक चल रहा है. डॉक्टर ने कहा है, दो साल तक इलाज चलेगा. इस दौरान हर महीने आठ सौ से एक हजार रुपये तक का खर्च आयेगा, लेकिन परिवार की माली हालत ऐसी नहीं है, जिसमें अंजलि का इलाज कराया जा सके. ये अंजलि का घर देख कर भी अंदाजा लगता है.
महादलित परिवार से आनेवाले गोनौर राम परिवार के साथ खेत के बीच बनी झोपड़ी में रहते हैं, अंजलि के अलावा परिवार में दो बच्चे हैं. इलाज के दौरान गोनौर को दस कट्ठा जमीन बंधक रखनी पड़ी. इसी से मिली रकम से अंजलि का इलाज हो रहा है, लेकिन पैसे खत्म होने के बाद उसका इलाज कैसे होगा. ये अंजलि के मां-पिता को समझ में नहीं आ रहा है. वो चिंतित हैं. पिता राजमिी का काम करते हैं. साथ ही ताड़ी भी उतारने का काम करते हैं, लेकिन बच्ची की तबियत खराब होने के कारण काम छूट गया है.
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