कृष्ण काली भगवती मंदिर में प्रतिमा की नहीं, वेदी की होती है पूजा
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 07 Oct 2024 8:15 PM
तारापुर नगर क्षेत्र के धौनी गांव स्थित कृष्ण काली भगवती मंदिर की स्थापना बंगाल के नदिया जिला के शांतिपुर ग्राम से आये दत्ता परिवार द्वारा 16वीं सदी के 1560 ई में स्थापित की गयी है.
कृष्ण काली भगवती मंदिर में भक्तों की मुरादें होती है पूरी, प्रतिनिधि, तारापुर. तारापुर नगर क्षेत्र के धौनी गांव स्थित कृष्ण काली भगवती मंदिर की स्थापना बंगाल के नदिया जिला के शांतिपुर ग्राम से आये दत्ता परिवार द्वारा 16वीं सदी के 1560 ई में स्थापित की गयी है. यहां बंगला रीति-रिवाज से मां भगवती की पूजा-अर्चना की जाती है.
बंगला पद्धति से होती है कृष्ण काली भगवती की पूजा
इस मंदिर के संबंध में बुजुर्ग धीरेंद्र मोहन दास कहते हैं कि यह मंदिर तारापुर अनुमंडल क्षेत्र का मोहनगंज दुर्गा मंदिर के बाद सबसे पुराना दूसरा मंदिर में से एक है. यह मंदिर बदुआ नदी की उप शाखा चौरा नदी के किनारे अति प्राचीन गांव धौनी में अवस्थित है. इस मंदिर के आचार्य बाबा महेश्वर आचार्य थे. जिन्होंने पूर्ण रूप से तांत्रिक पद्धति से इस मंदिर की स्थापना करायी और तब से आजतक इस मंदिर में बंगला पद्धति से ही पूजा-अर्चना की जाती है. बताया गया कि आदिकाल से ही इस गांव के बंगाली समुदाय के लोग ऋगवेद में वर्णित बंडुरानी नदी जिन्हें कालक्रम से बदुआ व बडुआ नदी के नाम से प्रसिद्धि है. इसी नदी से माता की पूजा के लिए कलश भराई होती है. इस मंदिर में कुंवारी कन्या को माता का स्वरूप मानकर मंदिर परिसर में भोजन कराया जाता है और उसके पश्चात सभी कन्याओं का चरण वंदन किया जाता है. नवरात्र या महाष्टमी के व्रत नहीं करने वाले उनके जूठन भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं.
प्रतिमा की नहीं, बल्कि वेदी की होती है पूजा
मंदिर में नवरात्रा पर नवमी की पूजा व रात्रि में पुष्पांजलि का आयोजन होता है. यानी माता पूर्णरूपेण दुर्गा पूजा में वात्सल्य रूप में होती है. जबकि बंग्ला पद्धति से की जाने वाली पूजा में छह पूजा की रात्रि में गंधाअदिवास का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है. जिसे माता का विवाह कहा जाता है और सात पूजा को माता के बनाये रूप दोला को माता के भक्त कंधे पर लेकर बदुआ नदी जाकर स्नान कराते हैं और कलश भरते हैं. जबकि छह पूजा की रात्रि में सरसों तेल के दीप जलाये जाते हैं वह दीप दशमीं पूजा के दिन प्रतिमा विसर्जन के बाद ही बंद होता है. इस मंदिर में आज भी जो भक्त अपनी मन्नत मांग कर पूजा-अर्चना करते हैं काली मां उनकी मुरादें पुरी करती है, लेकिन इस मंदिर में माता की प्रतिमा नहीं बनायी जाती है. यहां वेदी पर ही पूजा-अर्चना होती हैं. इस मंदिर में काली माता के साथ ही मां भगवती, भगवान कृष्ण व भगवान विष्णु की पूजा एक साथ होती है. इसीलिए इस मंदिर को माता के भक्तगण कृष्ण काली भगवती मंदिर कहते हैं. मंदिर में प्रथम, सप्तमी, अष्टमी व नवमी की रात्रि में बकरे की बलि दी जाती है.
डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar News Desk
यह प्रभात खबर का न्यूज डेस्क है। इसमें बिहार-झारखंड-ओडिशा-दिल्ली समेत प्रभात खबर के विशाल ग्राउंड नेटवर्क के रिपोर्ट्स के जरिए भेजी खबरों का प्रकाशन होता है।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए










