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अपने घर को आश्रम और अपने कर्म को साधना बनाओं : स्वामी निरंजनानंद

Updated at : 23 Jan 2026 8:36 PM (IST)
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अपने घर को आश्रम और अपने कर्म को साधना बनाओं : स्वामी निरंजनानंद

गुरु की शिक्षाओं का प्रसारण पूरे मानवजाति और समाज में करु.

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धूमधाम के साथ मनाया गया बिहार योग विद्यालय का 63 वां स्थापना दिवस बिहार की भूमि में बुद्ध की अहिंसा जन्मी, महावीर की विरक्ती और चाणक्य की नीति मुंगेर गंगा दर्शन विश्व योगपीठ में वसंत पंचमी पर शुक्रवार को गुरु पूजन, हवन और भजन-कीर्तन के साथ बिहार योग विद्यालय का 63 वां स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया गया. परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने बिहार योग विद्यालय के स्थापना से जुड़े रोचक प्रसंग और उसके उद्देश्य का विस्तृत वर्णन किया. जिसे सुन वहां मौजूद देश-विदेश पहुंचे श्रद्धालु नर-नारी मंत्रमुग्ध हो गये. स्वामी निरंजनानंद ने कहा कि एक युवा संन्यासी को उसके गुरु एक आदेश दिया कि तुम्हारा धर्म और कर्म विश्व में योग का प्रचार प्रसार करना है. उस आदेश को धार्य कर वह युवक संन्यासी गुरु आश्रम से चल पड़ता है. उसके मन में केवल एक ही तमन्ना थी कि मैं गुरु आदेश का पालन करु और गुरु की शिक्षाओं का प्रसारण पूरे मानवजाति और समाज में करु. इसी संकल्प के साथ वह संन्यासी निकल पड़ता है. भारत भ्रमण के लिए. गुरु ने जो आदेश दिया था अपने शिष्ट को वे थे हमारे परम गुरु दादा गुरु स्वामी शिवानंद सरस्वती और जो युवा संन्यासी गुरु की आज्ञा को पूरा करने निकल पड़े थे. वे थे हमारे गुरु स्वामरी सत्यानंद सरस्वती. उन्होंने कहा कि भारत भ्रमण के दौरान उनका बिहार में आगमन होता है और केवल बिहार में नहीं भारत के अन्य राज्यों में जाते है. समाज की परिस्थिति को समझने, लोगों के परेशानियों को जानने. उन्होंने चिंतन किया कि किस प्रकार मैं लोगों के समस्याओं और दुखों का निवारण कर पाऊंगा. 6 मई 1956 में उनका आगमन मुंगेर में एक भ्रमणार्थी के रूप में होता है. मुंगेर की धरती उनको आकर्षित करती है और उनका आह्वान करती है. उस युवा सन्यासी की यात्रा जारी रही. लेकिन मुंगेर की धरती उनको बुलाती रही और उस बुलावे के कारण 1963 में मुंगेर आकर योगाश्रम की नींव रखते और उसकी स्थापना करते है. आज इस आश्रम की 63 वां स्थापना जयंती हमलोग मना रहे है. उन्होंने कहा कि जब वे मुंगेर आए तो उन्होंने बिहार वासियों को संदेश दिया. वह संदेश बिहार के संतानों के नाम था. जिसमें लिखा था मैं तुम्हारी गलियों में चला हूं, तुम्हारे बीच बैठा हूं, मैंने तुम्हारी चरणों की धूल देखी है और आंखों की चमक भी. मैंने तुम्हारे प्रश्न सूने है, केवल अधरों से नहीं, दिलों से. बिहार मुरझाया हुआ प्रदेश नहीं है, यह गहन तपस्या में निरत भूमि है. यहां भूमि के भीतर छीपे बीज की तरह बाहर से निष्क्रीय प्रतित होता है. लेकिन भूमि के अंदर एक प्रबल प्रकाश जाग रहा है. इसी भूमि में बुद्ध की अहिंसा जन्मी है, महावीर की विरक्ती और चाणक्य की नीति. ये संस्कार तुम्हारे सांसों में जीवित है. मैं तुमसे संसार का त्याग नहीं मांगता, मैं संसार को जगाने के लिए कहता हूं. अपने घर को आश्रम बनाओ, अपने कर्म को साधना बनाओं. कंदाराओं में रहने वाले संतों को संसार की आवश्यकता नहीं होती है. मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुआ मौजूद थे.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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BIRENDRA KUMAR SING

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By BIRENDRA KUMAR SING

BIRENDRA KUMAR SING is a contributor at Prabhat Khabar.

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