दादा को याद कर आज भी आखें होती है नम

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दादा को याद कर आज भी आखें होती है नम 62 वें जन्म दिवस पर विशेष फोटो : 2(स्व. दिग्विजय सिंह की फाईल फोटो) प्रतिनिधि, जमुई पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व दिग्विजय सिंह उर्फ दादा का नाम जेहन में आते ही लोगों को उनके खोने की टीस की अनूभूति होने लगती है. बताते चलें कि उन्होंने […]

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दादा को याद कर आज भी आखें होती है नम 62 वें जन्म दिवस पर विशेष फोटो : 2(स्व. दिग्विजय सिंह की फाईल फोटो) प्रतिनिधि, जमुई पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व दिग्विजय सिंह उर्फ दादा का नाम जेहन में आते ही लोगों को उनके खोने की टीस की अनूभूति होने लगती है. बताते चलें कि उन्होंने अपना जीवन समाज के चतुर्दिक विकास के लिए समर्पित कर दिया था.14 नवंबर को उनके जन्म दिवस पर याद कर लोगों ने भारी मन से पुन: उन्हें नमन किया है. जानकारी के अनुसार स्व. दिग्विजय सिंह का जन्म जिला के गिद्धौर प्रखंड के नया गांव में 14 नवंबर 1953 को हुआ था. इनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गिद्धौर में हुई थी. 10 वीं की परीक्षा पास करने के पश्चात उन्होंने आगे की शिक्षा पटना से किया था. पटना विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात इन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली से स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की. पीएचडी की पढ़ाई के दौरान इन्होंने सन 1989 में ही जेएनयू विश्वविद्यालय से छात्र संघ का चुनाव में महासचिव के पद पर विजयी हुए थे. महासचिव का चुनाव जीतने के पश्चात ये राज्यसभा के सदस्य के रूप में चुने गये. सन 1990 में पूर्व प्रधानमंत्री स्व चंद्रशेखर सिंह की सरकार में ये पहली बार उप वितमंत्री बने और कुछ दिनों तक विदेश राज्य मंत्री के प्रभार में भी रहे. सन 1998 में इन्होंने बांका लोकसभा क्षेत्र से सांसद का चुनाव लड़ा. लेकिन इन्हें पराजय का सामना करना पड़ा. 1999 में इन्होंने जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ा और सांसद के रूप में निर्वाचित हुए. सन 1999 में बांका से सांसद बनने के पश्चात पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में बनी राजग सरकार में रेल राज्य मंत्री बने और पुन: विदेश राज्य मंत्री तथा उद्योग राज्य मंत्री भी बने. सन 2003 में इन्होंने दुर्गा पूजा के दौरान भारतीय सांस्कृतिक संबंद्ध परिषद के सहयोग से गिद्धौर महोत्सव नामक सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरुआत की और इसमें देश के नामी गिरामी कलाकारों को शिरकत करवाया. जो अविस्मरणीय है. सन 2004 में उन्होंने बांका लोकसभा से सांसद के चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा. लेकिन इसके बावजूद भी इन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए सतत प्रयत्नशील रहे. इन्होंने क्षेत्र के लोगों के मान सम्मान से कोई समझौता नहीं किया. अपनी राजनीतिक पकड़ और मिलनसार स्वभाव के वजह से झारखंड से राज्यसभा के सांसद चुने गये. सन 2009 के लोकसभा चुनाव में ये बांका से स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में विजयी हुए. इसी दौरान 24 जून 2010 को अचानक व काल के गाल में समा गये. और जमुई सहित पूरा देश एक होनहार को खो दिया.

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