मधुबनी: गलत ब्लड रिपोर्ट से फेल हो रही डॉक्टरों की दवाएं, सड़कों पर बिना लाइसेंस चल रहे सैकड़ों लैब
Published by : Purushottam Kumar Updated At : 03 Jun 2026 12:56 PM
सांकेतिक तस्वीर
Madhubani News: मधुबनी जिला मुख्यालय और प्रखंडों में सैकड़ों अवैध पैथोलॉजी लैब का संचालन. सीएस डॉ. हरेंद्र कुमार ने अवैध जांच घरों, अल्ट्रासाउंड और नर्सिंग होम के खिलाफ छापेमारी के लिए धावा दल का किया गठन.जानिए खबर विस्तार से…
Madhubani News: जिले के स्वास्थ्य महकमे की घोर उदासीनता और प्रशासनिक ढिलाई के कारण आज आम नागरिकों की जिंदगी और सेहत के साथ खिलवाड़ करने का एक बड़ा ‘काला खेल’ धड़ल्ले से फल-फूल रहा है. जिला मुख्यालय से लेकर सुदूर ग्रामीण प्रखंडों तक बिना किसी सरकारी निबंधन (रजिस्ट्रेशन) और तय मानकों की धज्जियां उड़ाकर सैकड़ों अवैध पैथोलॉजी लैब और डायग्नोस्टिक सेंटरों का संचालन किया जा रहा है.
फाइलों में महज 85 सेंटर रजिस्टर्ड
स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सिविल सर्जन कार्यालय के आधिकारिक दस्तावेजों में पूरे जिले के भीतर महज 85 पैथोलॉजी व डायग्नोस्टिक सेंटर ही विधिवत निबंधित (रजिस्टर) हैं. इसके विपरीत जमीनी हकीकत यह है कि जिले में लाइसेंसी लैब की संख्या नाममात्र है और अवैध रूप से चल रहे जांच घरों की संख्या सैकड़ों में है.
सरकारी प्रावधानों के अनुसार, हर पैथोलॉजी केंद्र पर मरीजों की सुविधा के लिए सभी प्रकार के टेस्ट का ‘रेट चार्ट’ (मूल्य सूची) दीवार पर प्रदर्शित करना अनिवार्य है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे. लेकिन जिले के अधिकांश सेंटरों पर कोई रेट चार्ट नहीं है. यहां ‘जैसा मरीज, वैसा शुल्क’ का मनमाना फॉर्मूला अपनाया जा रहा है; यानी एक ही खून या पेशाब की जांच के लिए अलग-अलग मरीजों से अलग-अलग राशि ऐंठी जा रही है.
डीएमएलटी कर्मी ही बन बैठे हैं डॉक्टर
नियमों के मुताबिक, किसी भी पैथोलॉजी लैब की रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने और जांच का अंतिम निर्णय देने वाला मुख्य संचालक एमबीबीएस या एमडी पैथोलॉजिस्ट होना अनिवार्य है. परंतु मधुबनी में कानून को ठेंगे पर रखकर मात्र डीएमएलटी (DMLT) की डिग्री रखने वाले या उनके अप्रशिक्षित सहयोगी ही लैब का संचालन कर रहे हैं. वे खुद ही विभिन्न गंभीर बीमारियों की जांच रिपोर्ट तैयार करते हैं और उस पर अवैध रूप से हस्ताक्षर (साइन) करके मरीजों को थमा देते हैं.
न योग्यता, न पॉल्यूशन सर्टिफिकेट
इसके अलावा, इन अवैध लैब के पास न तो बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Pollution Control Board) का अनिवार्य अनापत्ति प्रमाण पत्र है और न ही संक्रमित सुइयों व खून को नष्ट करने वाले पंजीकृत ‘मेडिकल वेस्ट फर्म’ का कोई वैध पंजीयन है, जो महामारी को खुला आमंत्रण दे रहा है.
कड़ा है जुर्माना, फिर भी बेखौफ हैं धंधेबाज
बिहार मद्यनिषेध, स्वास्थ्य एवं क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के कड़े प्रावधानों के तहत बिना रजिस्ट्रेशन के जांच घर चलाने पर भारी वित्तीय जुर्माने का कानून है:
- पहली बार पकड़े जाने पर: 50 हजार रुपये का नकद जुर्माना.
- दूसरी बार की गलती पर: सीधे दो लाख रुपये तक का आर्थिक दंड.
- तीसरी बार पकड़े जाने पर: पांच लाख रुपये का जुर्माना और संचालक पर सीधे जेल (प्राथमिकी) का प्रावधान है.
बावजूद इसके, विभाग द्वारा कभी भी धरातल पर कोई बड़ी या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाती, जिससे इन अवैध धंधेबाजों के हौसले बुलंद हैं.
सीएस ने मांगी थी सूची
इस महा-लापरवाही में स्थानीय स्तर के चिकित्सा प्रभारियों की भूमिका भी संदिग्ध है. सिविल सर्जन ने करीब छह महीने पहले जिले के सभी प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारियों (MOIC) को पत्र लिखकर अपने-अपने क्षेत्रों में संचालित वैध और अवैध पैथोलॉजी लैब्स, अल्ट्रासाउंड केंद्रों और क्लिनिकों की मैपिंग कर एक विस्तृत सूची मांगी थी.
छह महीने बाद भी प्रभारी चिकित्साधिकारियों ने साधी चुप्पी
हैरत की बात यह है कि छह महीने बीत जाने के बाद भी महज गिने-चुने प्रभारियों ने ही अपनी आधी-अधूरी रिपोर्ट सीएस दफ्तर को भेजी है. सबसे खराब स्थिति खुद मधुबनी जिला मुख्यालय की है, जहां आज तक स्वास्थ्य विभाग की टीम ने एक भी पैथोलॉजी लैब की भौतिक जांच या औचक निरीक्षण नहीं किया है.
अप्रशिक्षित कर्मियों की गलत रिपोर्ट से डॉक्टरों के नुस्खे हो रहे फेल
इस प्रशासनिक उदासीनता का सीधा और जानलेवा असर आम मरीजों पर पड़ रहा है. इन केंद्रों में काम करने वाले अप्रशिक्षित और नौसिखिए कर्मी मरीजों के खून और अन्य सैंपल लेते हैं. इनकी गलत और त्रुटिपूर्ण रिपोर्ट के आधार पर ही डॉक्टर मरीजों को हैवी एंटीबायोटिक और अन्य दवाएं लिख देते हैं.
रिपोर्ट गलत होने के कारण मरीजों की वास्तविक बीमारी का सही समय पर पता नहीं चल पाता है, जिससे कई बार मरीजों की स्थिति अत्यंत गंभीर हो जाती है. वहीं, सीएस कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया इतनी ढीली है कि आवेदन देने से पहले या बाद में किसी भी स्तर पर लैब के इंफ्रास्ट्रक्चर की भौतिक जांच नहीं की जाती, जिससे कोई भी आसानी से सर्टिफिकेट पा लेता है.
चरणबद्ध तरीके से होगी छापेमारी: सिविल सर्जन
इस गंभीर और त्रस्त कर देने वाली व्यवस्था पर कड़ा रुख अपनाते हुए मधुबनी के सिविल सर्जन डॉक्टर हरेंद्र कुमार ने बताया कि मामले को गंभीरता से लिया गया है और अब किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी. जिले से लेकर प्रखंड स्तर तक एक विशेष प्रशासनिक ‘धावा दल’ (टास्क फोर्स) का गठन कर दिया गया है.
सभी प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारियों को अंतिम अल्टीमेटम देते हुए निर्देश दिया गया है कि वे अपने क्षेत्रों में चल रहे अवैध जांच घरों, नर्सिंग होम और अल्ट्रासाउंड केंद्रों की अंतिम सूची तुरंत सौंपें. इसके बाद पूरे जिले में एक साथ चरणबद्ध तरीके से सघन छापेमारी अभियान चलाया जाएगा और बिना निबंधन व मानक के चल रहे सभी अवैध केंद्रों को सील करते हुए उनके मालिकों पर एफआईआर (FIR) दर्ज कर जेल भेजा जाएगा.
मधुबनी से अनिल कुमार झा की रिपोर्ट
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