पांच दिन की ट्रेनिंग के बाद युवाओं को मिला बकरी पालन का गुर, KVK ने दिए स्वरोजगार के टिप्स

Author Sanjay Kumar|Edited by Aaruni Thakur
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कृषि विज्ञान केंद्र सुखेत में पांच दिवसीय बकरी पालन प्रशिक्षण संपन्न

प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल लोग - फोटो: Prabhat Khabar

झंझारपुर के कृषि विज्ञान केंद्र सुखेत में पांच दिवसीय बकरी पालन प्रशिक्षण का समापन हुआ, जिसमें युवाओं को स्वरोजगार के लिए आधुनिक तकनीक सिखाई गई।

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Goat Farming Training: ग्रामीण युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), सुखेत में आयोजित पांच दिवसीय बकरी पालन प्रशिक्षण कार्यक्रम का बुधवार को समापन हो गया. प्रशिक्षण में जिले के विभिन्न गांवों से आए युवक-युवतियों को वैज्ञानिक तरीके से बकरी पालन की सैद्धांतिक और व्यावहारिक जानकारी दी गई.

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पांच दिन तक मिला व्यावहारिक प्रशिक्षण

शनिवार से शुरू हुए इस नि:शुल्क प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन केवीके के वरीय वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ. शिशिर कुमार गंगवार के नेतृत्व में किया गया. उन्होंने बताया कि कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है.

सही नस्ल और बेहतर आवास पर दिया गया जोर

विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. जगपाल ने कहा कि बकरी पालन की सफलता सही नस्ल के चयन और वैज्ञानिक आवास व्यवस्था पर निर्भर करती है. उन्होंने स्थानीय संसाधनों से कम लागत में सुरक्षित और हवादार शेड बनाने की तकनीक भी प्रतिभागियों को सिखाई.

'ग्रामीणों का एटीएम' है बकरी पालन

वैज्ञानिक डॉ. राहुल सिंह राजपूत ने कहा कि बकरी पालन कम पूंजी और कम जगह में शुरू होने वाला लाभदायक व्यवसाय है. ग्रामीण क्षेत्रों में इसे "एटीएम" की तरह माना जाता है, क्योंकि जरूरत पड़ने पर बकरियों को बेचकर तुरंत नकदी प्राप्त की जा सकती है.

बीमारी से बचाव के लिए नियमित टीकाकरण जरूरी

बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, पटना के वैज्ञानिक डॉ. पुष्पेंद्र सिंह ने बताया कि पीपीआर, ईटी और खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियों से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण और कृमिनाशक दवा देना बेहद जरूरी है. उन्होंने शुरुआती लक्षण पहचानकर तुरंत उपचार कराने की सलाह दी.

संतुलित आहार और नस्ल सुधार पर भी चर्चा

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. रोहित जायसवाल ने बताया कि बकरियों की अच्छी वृद्धि और उत्पादन के लिए हरा चारा, सूखा चारा और खनिज मिश्रण का संतुलित उपयोग आवश्यक है. उन्होंने इनब्रीडिंग से बचने और बेहतर नस्ल सुधार के लिए प्रमाणित बकरों के उपयोग की सलाह भी दी.

प्रशिक्षुओं को मिला प्रमाणपत्र

प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन पर सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए. वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई कि प्रशिक्षण से प्राप्त जानकारी के आधार पर युवा बकरी पालन को रोजगार का मजबूत माध्यम बनाकर अपनी आय बढ़ा सकेंगे.

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संजय कुमार

लेखक के बारे में

By संजय कुमार

संजय कुमार प्रिंट माध्यम में 15 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 3 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. चौसा (मधेपुरा) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक कार्यों, शिक्षा, राजनीति व खेल में रुचि रखते हैं.

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