बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन

Updated at : 20 Apr 2024 10:42 PM (IST)
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बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन

यह नई तकनीक है बायोफ्लॉक तकनीक.

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मधुबनी. खेती में नित नये-नये प्रयोग हो रहे हैं. एक प्रयोग हुआ है मछली पालन में, जिसके तहत आपको मछली पालने के लिए किसी तालाब की जरूरत नहीं होगी. इसमें आप कहीं पर भी गोल से टैंक तैयार कर उनमें मछली पालन कर सकते हैं. हालांकि इस तकनीक से मछली पालन का बिजनेस करने में तालाब से अधिक खर्च आएगा. लेकिन अच्छी बात यह है कि इससे आपको मुनाफा भी तगड़ा होगा. यह नई तकनीक है बायोफ्लॉक तकनीक. हरलाखी उमगांव के रीना देवी 25 लाख की लागत से पच्चीस बायोफ्लॉक टैंक का निर्माण करा रही है. बायोफ्लॉक तकनीक पूरी तरह से इको फ्रेंडली है. इसमें मछलियां तेज गति से वृद्धि करती हैं. विदित हो कि जिले के पंडौल, रहिका, खुटौना, राजनगर एवं जयनगर में किसान बायोफ्लॉक तकनीक से मछली का पालन कर लाभान्वित हो रहे हैं. मछली पालन को कृषि का दर्जा देने के लिए सरकार 60 प्रतिशत तक अनुदान भी दे रही है. बायोफ्लॉक तकनीक एक आधुनिक व वैज्ञानिक तरीका है. मछली पालन के इस तकनीक को अपनाते हुए मत्स्य पालक न सिर्फ नीली क्रांति के अग्रदूत बनेंगे बल्कि बेरोजगारी से भी मुक्ति मिलेगी. बायोफ्लॉक तकनीक में एक एयरेटर की ज़रूरत होती है, जो पानी में ऑक्सीजन की मात्रा को बढ़ाने में सहायक होता है. टैंकों में पानी की सप्लाई के लिए एक इनलेट पाइप लगा होता है, गंदे पानी को निकालने के लिए एक आउटलेट पाइप टैंक के निचले हिस्से में लगा होता है. टैक में इनलेट, आउटलेट और एयरेटर सिस्टम को चलाने के लिए 4 टैंक के लिए 2 हार्स पॉवर बिजली की सप्लाई की ज़रूरत पड़ती है. यानि इस तकनीक में बिजली की खपत एक दम कम होती है.बायो फ्लॉक तकनीक में सीमेंट के 10 हजार लीटर क्षमता के एक टैंक को बनाने में लगभग 28 से 30 हजार रुपए का खर्च आता है. इसमें उपकरण और मजदूरी भी शामिल है टैंक का आकार जितना बढ़ेगा लागत उतनी बढ़ती चली जाएगी. इसके अलावा मछलियों के आहार और प्रबंधन 5 से 6 महीने 10 से 15 हजार का खर्च आता है. बायोफ्लॉक तकनीक को सामान्य शब्दो में कहें तो टैंक के माध्यम से मछली पालन कहा जाता है. नॉर्मल टंकी में मछली डालने से कुछ ही दिनों में वह मर जाती है. कारण पानी में अमोनिया का लेवल बढ़ जाता है. लेकिन बायोफ्लॉक सिस्टम में तारकोलिक या सीमेंट का टैंक होता है. इस टैंक में प्रोवाइडिक डाला जाता है. जो वेनिफिशियल बैक्ट्रीरिया होता है. उसे एक्टिव कर टंकी में डालते हैं. यह बहुत सारे बैक्ट्रीरिया का उत्पादन करता है. फिर उसके मलमूत्र को फ्लॉक में कन्वर्ट करते हैं. जो बायोफ्लॉक कहलाता है. इसी बायोफ्लॉक को फिर मछली दोबारा खाती है. यानी बाहर से जो दाना देते हैं वह बहुत कम देना पड़ता है. सामान्य तौर पर एक एकड़ तालाब में 20 हजार मछली डालते हैं तो एक मछली को 300 लीटर पानी में रखा जाता है. जबकि इस सिस्टम में टैंक के जरिए एक हजार लीटर पानी में 110-120 मछली डाल सकते हैं. इस हिसाब से एक मछली को सिर्फ 9 लीटर पानी में रखा जाता है. जिला मत्स्य पदाधिकारी विनय कुमार ने कहा कि सरकार मछली पालन को कृषि का दर्जा देने के लिए बायोफ्लॉक तकनीक को बढ़ावा दे रही है. किसान कम जगह में टैंक के माध्यम से मछली पालन कर अच्छी कमाई कर सकते हैं.

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