धरती कांपी, तो मचेगी तबाही
मधुबनीः यदि जिले में वर्ष 1934 या 1988 की तरह भूकंप आयी तो भयानक तबाही मचेगी. ना सिर्फ लोगों की वर्षो की कमाई से बनायी गयी मकान रेत की दीवार की तरह झटके में ढेर हो जायेंगे, बल्कि लाखों की जान माल की क्षति भी हो सकती है. दरअसल यह जिला भूकंप के अति संवेदनशील […]
मधुबनीः यदि जिले में वर्ष 1934 या 1988 की तरह भूकंप आयी तो भयानक तबाही मचेगी. ना सिर्फ लोगों की वर्षो की कमाई से बनायी गयी मकान रेत की दीवार की तरह झटके में ढेर हो जायेंगे, बल्कि लाखों की जान माल की क्षति भी हो सकती है. दरअसल यह जिला भूकंप के अति संवेदनशील जोन 5 में है. इसमें भूकंप के तीव्र झटके आने की अधिक संभावना बनी रहती है. जिले में सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं के साथ-साथ आम लोगों द्वारा जिस प्रकार भूकंपरोधी मकान बनाये जाने के मानक को दर किनार कर बड़े बड़े भवन बनाये जा रहे हैं. उससे यह संभावना है कि यदि भूकंप के तेज झटके आये तो लोगों को सुरक्षित स्थान पर जाने का अवसर भी नहीं मिलेगा. सरकारी स्तर पर नियम व निर्देश का सही रूप से पालन नहीं करना एवं लोगों में जागरूकता का अभाव रहने के कारण लोग अपने मकान में भूकंपरोधी तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं. इस कारण भूकंप आने पर भयानक तबाही मचेगी.
विभाग के पास ठोस नियम नहीं
भूकंप से बचाव के लिये आपदा विभाग या भवन निर्माण विभाग के पास ठोस नियम या कानून भी नहीं है. आपदा विभाग साल में एक दो बार भूकंप के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये कार्यशाला का आयोजन कर अपनी भूमिका का इतिश्री कर अपने दायित्व पूरा करने की बात करती है, तो भवन विभाग के पास उपलब्ध मॉडल के तहत मकान बनाने के लिये कोई संपर्क ही नहीं करता. वर्षाें पूर्व भवन विभाग के पास भूकंप रोधी मकान निर्माण के लिये विभाग द्वारा मॉडल जारी किया गया था. लेकिन यह मॉडल वेबसाइट व विभाग के फाइलों तक ही सिमट कर रह गयी है. सरकार ने हर सरकारी भवन निर्माण में उक्त मॉडल का उपयोग करने एवं भूकंप रोधी तकनीक का उपयोग करने का निर्देश जारी किया था. लेकिन ना तो सरकारी भवन निर्माण में उक्त तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, और ना ही निजी स्तर पर ही लोग अपने मकान में भूकंप रोधी तकनीक का उपयोग कर रहे हैं. शहरों में हर दिन नये नये बड़े बड़े भवन इस कदर बनाये जा रहे हैं कि यदि भूकंप आयी तो लोगों को ढूंढ़ने से भी सुरक्षित जगह नहीं मिल सकेगा. सरकारी जमीन का इस कदर अतिक्रमण कर लिया है कि मुख्य सड़क गली का रूप ले चुका है. समस्त शहर में एक भी ऐसा खाली जगह नहीं है जहां भूकंप के दौरान लोग भाग कर अपनी जान बचा सकें.
फाइलों तक ही रहता उपाय
आपदा विभाग द्वारा भले ही भूकंप सुरक्षा सप्ताह का आयोजन कर लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया जाता है. लेकिन इसे धरातल पर उतारने की सारी कवायद फाइलों तक ही सिमट कर रह जाती है. जिले में विगत साल में करीब 4 बार आपदा से बचाव की जानकारी को लेकर कार्यशाला आयोजित की गयी. इसके तहत हर विद्यालय में जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन बच्चों के बीच किया जाना था. जन प्रतिनिधि एवं आम लोगों को भी पंचायत स्तर पर जागरूक करने की योजना सरकार ने चलायी. लेकिन यह योजना जिला मुख्यालय स्तर पर आयोजित कार्यशाला तक ही सिमट कर रह गयी. इन दिनों आपदा विभाग द्वारा भूकंप सुरक्षा सप्ताह कार्यक्रम संचालित की जा रही है. इसके तहत हर थाने पर आम लोगों के साथ भूकंप से बचाव विषय पर कार्यशाला आयोजित की जानी थी. लेकिन अबतक किसी भी थाने पर इस प्रकार की कार्यशाला का आयोजन किये जाने की सूचना प्राप्त नहीं है.
आंकड़ों के आइने में
आपदा विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1934 में आये भूकंप के दौरान दरभंगा जिला (उस समय मधुबनी दरभंगा जिला का अनुमंडल था.) में 2149 लोगों की मौत हो गयी थी. इसमें मधुबनी अनुमंडल में करीब 500 लोगों की मौत हो गयी थी. भूकंप दोपहर के करीब 2 बज कर 13 मिनट एवं 22 सेकेंड पर आया था. जो तीन से चार मिनट तक रहा व उसकी तीव्रता 8.3 मापी गयी थी.
आंकड़ों में 1988 का भूकंप
नेपाल सीमा क्षेत्र में 21 अगस्त को सुबह करीब 5 बजे आयी थी. रिएक्टर स्केल पर इसकी तीव्रता 6.7 मापी गयी थी. भूकंप के कारण जान माल की भारी क्षति हुई थी. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इसमें 99 लोगों की मौत हुई थी जबकि 792 लोग घायल हो गये थे. वहीं इस भूकंप के कारण 5463 मकान पूर्णत: क्षतिग्रस्त हो गया था जबकि 14537 मकान अंशत: क्षतिग्रस्त हुआ था.
क्या कहते हैं अधिकारी
इस बाबत जिला आपदा प्रभारी पदाधिकारी अशोक कुमार गुप्ता ने बताया है कि लोगों में भूकंप से बचने के लिए जागरूक होना आवश्यक है. लोगों को जागरूक करने के लिए विभाग द्वारा समय-समय पर कार्यक्रम चलाये जाते हैं.
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