कंदर्पीघाट में लगा विजय स्तंभ

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मधुबनीः अंधराठाढ़ी प्रखंड क्षेत्र के कंदर्पीघाट में काफी मेहनत के बाद शुक्रवार को मिथिला विजय स्तंभ स्थापित कर दी गयी. डीआरडीए निदेशक रंग नाथ चौधरी के देख रेख व निर्देशन में इस विजय स्तंभ को आस पास स्थापित की गयी. विजय स्तंभ को राजस्थान के किशनगढ़ से कुछ माह पूर्व मंगाया गया था. विजय स्तंभ […]

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मधुबनीः अंधराठाढ़ी प्रखंड क्षेत्र के कंदर्पीघाट में काफी मेहनत के बाद शुक्रवार को मिथिला विजय स्तंभ स्थापित कर दी गयी. डीआरडीए निदेशक रंग नाथ चौधरी के देख रेख व निर्देशन में इस विजय स्तंभ को आस पास स्थापित की गयी.

विजय स्तंभ को राजस्थान के किशनगढ़ से कुछ माह पूर्व मंगाया गया था. विजय स्तंभ के स्थापित होने से झंझारपुर अनुमंडल सहित समस्त जिला काफी गौरवान्वित है.

स्थानीय लोगों का रहा सराहनीय सहयोग

कंदर्पीघाट में विजय स्तंभ बनाने की कवायद वर्ष 2010 में प्रारंभ हो गयी थी. झंझारपुर के तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी रंग नाथ चौधरी जो वर्तमान में डीआरडीए के निदेशक के पद पर पदस्थापित है. उन्होंने 20 जनवरी 2010 को निर्माण कार्य की आधारशीला रखी थी. लगातार तीन साल तक व्यक्तिगत रूप से इस कार्य का देख रेख करते हुए स्थानीय लोगों व कई अन्य लोगों के सहयोग से इस स्तंभ को स्थापित कराने में सफलता प्राप्त किये. कंदर्पीघाट का इतिहास मिथिलांचल के आम अवाम के वीरता और साहस की गाथा बयां करती है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 1745 ई. में अलीवर्दी खां एवं बबरजंग के बीच जाफर खां के वाग में भयानक लड़ाई लड़ी गयी थी. जिसमें मिथिला नरेश नरेंद्र सिंह ने अलीवर्दी खां के मदद में बहादुरी से लड़ाई में साथ दिया. उस लड़ाई में अलीवर्दी खां की जीत हुई थी. नरेंद्र सिंह के लड़ाई में मदद करने के कारण अलीवर्दी खां ने मिथिला राज्य को कर मुक्त कर दिया था. बाद में 17 48 में अलवर्दी खां के दामाद हैवत जंग को अफगानियों ने मार दिया. 1752 में राम नारायण को नायक सूबेदार पद मिला. राम नारायण का वसूलने के मामला में बेहद क्रुर माना जाता था. उसे जब मिथिला के कर नहीं देने की बात मालूम हुई तो उसने राजा नरेंद्र सिंह से कर की मांग की. इसे नरेंद्र सिंह ने इनकार कर दिया. इस इनकार के बाद भिखारी महथा को तिरहुत फतह करने के लिये भेजा गया.

भिखारी महथा करीब 5 हजार सैनिक के साथ आक्रमण कर दिया. यह लड़ाई हरिणा के मैदान में लड़ा गया. इतिहासकारों के अनुसार नरेंद्र सिंह के दादा उमराव सिंह के इस युद्ध में शहीद होने के बाद नरेंद्र सिंह खुद लड़ाई में कूद पड़े. अपने राजा को लड़ाई करते देख सेना के साथ साथ आम अवाम भी जातिवाद से ऊपर उठकर लड़ाई के मैदान में आ गये और 1753 ई. के 5 अक्तूबर से 7 अक्तूबर तक भीषण लड़ाई हुई और नरेंद्र सिंह उस लड़ाई में विजयी हुई. इतिहास के सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी का ही दिन था. इसी दुर्गा पूजा में विजय स्तंभ का स्थापित होना काफी अहमद माना जा रहा है. इस अवसर पर झंझारपुर के एसडीओ महेश झा, राधा रमण झा, सिया रमण झा सहित सैकड़ों लोग उपस्थित थे.

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