मॉडल बस स्टैंड बना असामाजिक तत्वों का अड्डा

जिला मुख्यालय के पश्चिमी बाइपास में करोड़ों की लागत से बना अत्याधुनिक बस स्टैंड आज विकास की मिसाल नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, बदइंतजामी और करोड़ों की राशि के बर्बादी का प्रतीक बना हुआ है.
गंदगी, बदबू व अव्यवस्था से बस ड्राइवर व कंडक्टर सहित अन्य लोग खुले में शौचालय जाने को विवश
सुविधाओं का ‘कब्रिस्तान’ बन चुका है मॉडल बस स्टैंड
मधेपुरा.
जिला मुख्यालय के पश्चिमी बाइपास में करोड़ों की लागत से बना अत्याधुनिक बस स्टैंड आज विकास की मिसाल नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, बदइंतजामी और करोड़ों की राशि के बर्बादी का प्रतीक बना हुआ है. यात्रियों की सुविधा के नाम पर बनाये गये इस बस स्टैंड पर आज हालात ऐसे हैं कि न तो यात्री के लिए कोई व्यवस्था है और न ही बस संचालक नियमित बस का संचालन को तैयार हैं. नतीजा बस स्टैंड विरान, सुविधाएं जर्जर और असामाजिक तत्वों का बसेरा बना हुआ है. बस स्टैंड पर वेटिंग हॉल, प्लेटफॉर्म, रैंप, पेयजल, शौचालय, यूरिनल, रोशनी और सुरक्षा जैसी तमाम सुविधाएं कागजों में तो मौजूद हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है. वायरिंग उखड़ी हुई, बिजली बोर्ड टूटे पड़े हैं, कई जगहों पर शॉर्ट सर्किट का खतरा मंडरा रहा है. प्लेटफॉर्म और प्रतीक्षालय में गंदगी का अंबार है. बताया जा रहा है कि महीनों से यहां नियमित सफाई तक नहीं हुई. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यहां से सिर्फ पटना रूट की बसें दिन में लगती है. शाम होते ही निकल जाती है, जबकि अन्य जगहों के लिए बसों का संचालन नहीं होता है. मधेपुरा से होकर गुजरने वाली कोई भी बसें तो बस स्टैंड में प्रवेश ही नहीं करतीं, बल्कि सड़क किनारे यात्रियों का उतार-चढ़ाव कराती हैं. इससे एक ओर जहां यात्रियों की सुरक्षा खतरे में है, वहीं दूसरी ओर सड़क जाम और दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ गयी है.करीब 22 लाख का शौचालय बना खंडहरबस स्टैंड परिसर में करीब 22 लाख रुपये की लागत से बने शौचालय को लेकर भी सवालों की बाढ़ है. लोगों का आरोप है कि शौचालय या तो बंद रहता है या फिर उसकी हालत इतनी बदहाल है कि उपयोग करना किसी सजा से कम नहीं. गंदगी, बदबू व अव्यवस्था ने दिन में लगे बस के ड्राइवर व कंडक्टर सहित अन्य लोगों को मजबूर कर दिया है कि वे खुले में शौचालय जाने को विवश हों. यह स्थिति स्वच्छ भारत अभियान पर भी करारा तमाचा है. प्रशासनिक लापरवाही के अभाव में उजड़ता बस स्टैंडनव-निर्मित बस स्टैंड में यात्रियों के बैठने के लिए स्टील चेयर लगायी गयी थी. शेड और रैंप बनाए गए थे ताकि बुजुर्ग, दिव्यांग व महिलाएं आसानी से बस तक पहुंच सकें, लेकिन रखरखाव के अभाव में ये सभी सुविधाएं अनुपयोगी हो चुकी हैं. कई जगहों पर टूट-फूट साफ दिखती है. रात होते ही बस स्टैंड अंधेरे में डूब जाता है, इससे असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगने लगता है. स्थानीय लोगों का कहना है कि करोड़ों खर्च कर जो बस स्टैंड बनाया गया था, वह अब सुविधाओं का ‘कब्रिस्तान’ बन चुका है. प्रशासन और नगर परिषद की उदासीनता के कारण बस स्टैंड का उद्देश्य ही समाप्त होता जा रहा है. स्थानीय नागरिक ने आरोप लगाया है कि जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत से करोड़ों रुपये खर्च तो कर दिये गये, लेकिन न गुणवत्ता का ध्यान रखा गया और न रखरखाव की कोई ठोस व्यवस्था की गयी.
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