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मैं हिन्दी हूं, साल में एक बार आती हूं, व्यथित हो अलख जगाती हूं

Updated at : 14 Sep 2025 10:21 PM (IST)
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मैं हिन्दी हूं, साल में एक बार आती हूं, व्यथित हो अलख जगाती हूं

मैं हिन्दी हूं, साल में एक बार आती हूं, व्यथित हो अलख जगाती हूं

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मधेपुरा. हिंदी दिवस पर आजाद पुस्तकालय में एक शाम हिंदी के नाम काव्यगोष्ठी की शुरुआत अध्यक्ष प्रो विनय कुमार चौधरी की अध्यक्षता में की गयी. हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले साहित्यकारों, कवियों, उपन्यासकारों की कड़ी में पहली पंक्ति के बड़े नाम भारतेंदु हरिश्चंद, प्रेमचंद्र, रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त, नागार्जुन, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, फणीश्वर नाथ रेणु आदि की तस्वीर पर संयुक्त रूप से पुष्पांजलि अर्पित की गयी. इसके बाद हिंदी दिवस की थीम हिंदी राष्ट्रीय एकता व वैश्विक पहचान की ताकत पर प्रकाश डालते हुए सबों ने एक स्वर में कहा कि भारत भारती की आन, बान, शान और पहचान है हिंदी. कविताओं में दर्द, मोहब्बत, चिंता का दिखा संगम आजाद पुस्तकालय के सचिव डॉ हर्षवर्धन सिंह राठौर के संचालन में हिंदी दिवस को समर्पित एक शाम हिंदी के नाम काव्य संध्या की शुरुआत करती युवा कवयित्री गरिमा उर्विशा ने औरत की क्षमता को रेखांकित करते कहा मैंने देखा है अकेली औरतों को अकेली औरतें कोमल नहीं होती, वे होती हैं फौलादी जिनमें आत्मविश्वास प्रचुर होता है. वहीं पुरुष प्रधान समाज के दिखावे पर चोट करते हुए कहा कि वे नहीं बनना चाहती कभी देवी, नहीं करवाना चाहती अपनी पूजा, उसे विशेष सौम्य और कोमल भी नहीं बनना. रमन कुमार ने व्यवस्था पर कटाक्ष करते कहा कि ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दोहरा हुआ होगा, मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा, वहीं सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत बयां करते कहा यहां तक आते-आते सुख जाती है सभी नदियां, हमें मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा. गजलकार सियाराम यादव मयंक ने हिंदी के महत्व को रेखांकित करते कहा कि भारत की पहचान है हिंदी, जन-जन की सम्मान है हिंदी, राजा, रंक, फकीर, साधुजन, गीता कुरान, बाइबिल भारत की पहचान है हिंदी. समाजशास्त्री डॉ आलोक कुमार ने चुनौतियों के बीच नई पहल की बात करते कैनवासे जिंदगी कविता प्रस्तुत करते कहा आंखे में समाए सपने बड़े गढ़ने होंगे. नए मुहावरे, तस्वीर यूं नहीं बदलेगी, लेने होंगे तुझे फैसले कड़े. भूखों को रोटी नहीं मिलती, कुरसी मिलते फाग सुनाते हैं विशिष्ट अतिथि वरीय साहित्यकार प्रो सिद्धेश्वर काश्यप ने गजल के माध्यम से वर्तमान राजनीति के चाल चरित्र को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि अपना अपना भाग जगाते हैं, लेकिन खुल के आग लगाते हैं. रामा रहमां सिर्फ रटा कर के, छुप-छुप कर ये नाग बनाते हैं. वहीं धर्म की राजनीति पर प्रहार करते हुए कहा कि मंदिर मस्जिद हैं बिलखा करते, माथे पर ये पाग सजाते हैं, भूखों को रोटी नहीं मिलती, कुर्सी मिलते फाग सुनाते हैं. सम्मानित अतिथि चर्चित व्यंग्यकार शशिकांत सिंह शशि ने अपनी व्यंग्यात्मक प्रस्तुतियों के द्वारा वर्तमान हालात को प्रस्तुत किया. मुख्य अतिथि स्नातकोत्तर अंग्रेजी विभागाध्यक्ष,सह पूर्व कुलसचिव प्रो विश्वनाथ विवेका ने हिंदी दिवस की सरकारी औपचारिकता पर केंद्रित रचना प्रस्तुत करते कहा हां मैं हिन्दी हूं. 14 सितंबर वाली हिंदी, साल में एक बार आती हूं, व्यथित हो अलख जगाती हूं. गोष्ठी के अंत में सभी साहित्यकारों को आजाद पुस्तकालय की ओर से साहित्यिक सामग्री के साथ सम्मानित किया गया.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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Kumar Ashish

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By Kumar Ashish

Kumar Ashish is a contributor at Prabhat Khabar.

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