कॉपरेटिव बैंक के बंद हो जाने से परेशान है किसान,

Published at :15 Jan 2016 8:04 PM (IST)
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कॉपरेटिव बैंक के बंद हो जाने से परेशान है किसान,

कॉपरेटिव बैंक के बंद हो जाने से परेशान है किसान, — पैक्सों की स्थिति बदतर, कर्ज में डूबे किसान — — कार्यरत कर्मचारियों का समायोजन नहीं, हाईकोर्ट का आदेश भी बेअसर — प्रतिनिधि, उदाकिशुनगंज, मधेपुरा आजादी से पूर्व स्थापित मधेपुरा सहरसा सुपौल सेंटल कॉपरेटिव बैंक के बंद हो जाने से किसानों को काफी नुकसान उठाना […]

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कॉपरेटिव बैंक के बंद हो जाने से परेशान है किसान, — पैक्सों की स्थिति बदतर, कर्ज में डूबे किसान — — कार्यरत कर्मचारियों का समायोजन नहीं, हाईकोर्ट का आदेश भी बेअसर — प्रतिनिधि, उदाकिशुनगंज, मधेपुरा आजादी से पूर्व स्थापित मधेपुरा सहरसा सुपौल सेंटल कॉपरेटिव बैंक के बंद हो जाने से किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है. खास कर लघु व मंजौले तबके के किसानों की आर्थिक की स्थिति बदतर होती चली जा रही है. कर्ज में जीना व कर्ज में ही मर जाना मानों किसानों की नियति बन गयी है. नियति तो बदल सकती है. जब उक्त बैंक को सरकार चालू करा दें. वहीं दूसरी और कार्यरत शाखा प्रबंधक व अन्य कर्मचारियों की सेवा समायोजन नहीं किये जाने से ऐसे परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर परती चली गयी है. — कब हुई थी स्थापना — उक्त बैंक की स्थाना 1902 ई में की गयी थी. तब बैंक का खास मकशद रहा था कि किसान उन्नत तरीके से खेती कर सके. वास्तव में किसानों को मदद मिलती भी थी. फलस्वरूप सभी तबके के किसान उन्नत खेती कर पाते थे. — बैंक हुआ बंद — राज्य सरकार की दिशाहीनता व किसान विरोधी नीति के कारण 2003 ई में मधेपुरा सहरसा सुपौल, सेंट्रल कॉपरेटिव बैंक के सभी शाखाओं को बंद कर दिया गया. जिसके अधीन अनुमंडल के बिहारीगंज व आलमनगर शाखा भी आता था. इतना ही नहीं उक्त बैंक के अलावे प्रदेश के दरभंगा व छपरा सेंट्रल कॉपरेटिव बैंक के सभी शाखाओं को भी बंद कर दिया गया. जबकि प्रदेश के अन्य जगहों पर आज भी कॉपरेटिव बैंक संचालित है. इसे सरकार का शौतेलापन व्यवहार नहीं तो और क्या कहा जा सकता है. आखिर राज्य सरकार किसी परिस्थिति में तीन – तीन बैंकों के सभी शाखाओं को बंद करने का निर्णय ली. इसका खुलासा आज तक नहीं हो सका. — किसानों को होता था लाभ — जब कॉपरेटिव बैंक संचालित था तो वर्ष में दो बार रब्बी और खरीफ फसल के मौसम खेती करने के लिए लॉन दिया जाता था. प्रावधान के अनुसार बैंक से खाद बीज के अलावे पटवन व निकोनी कराने के लिए नगद राशि भी उपलब्ध कराया जाता था. इस तरह के आर्थिक सहायता मिलने से किसान आसानी से खेती कर पाते थे. तब महाजनों से सूध पर रूपये उठा कर खेती करने की नौबत नहीं आती थी. लेकिन बैंक को बंद कर देने से किसान अच्छी तरह फसलों का उत्पादन नहीं कर पाते है. या तो महाजनों से कर्ज उठा कर खेती किया करते है. जो घाटे की खेती साबित हो रहा है. — नकली खाद बीज से मिलती थी मुक्ति — जब बैंक से ही खाद बीज मिला करता था तो खाद बीज की समस्या किसानों के सामने नहीं आती थी. लेकिन अब तो दुकान से खादबीज लेकर खेती करना पड़ रहा है. जिससे अक्सर किसानों को नकली खाद बीज खरीदना पड़ रहा है. जिससे फसलों के पैदावार पर असर पड़ रहा है. अधिक लागत खर्च के बावजूद भी जब फसल मारी जाती है तो किसान कर्ज में डूबते चले जाते है. हालांकि नकली खाद बीज का कारोबार विभागीय पदाधिकारी के मेल मिलाफ से ही दुकानदार किया करते है. — पैक्स था समृद्ध — जब कॉपरेटिव बैंक संचालित था तब पैक्स काफी काफी समृद्ध हुआ करता था. चूंकि किसानों को पैक्स अध्यक्ष व पैक्स मैनेजर के अनुशंसा पर ही लोन मिला करता था. किसानों को उपलब्ध कराये गये लॉन की राशि सूद समेत पैक्स मैनेजर ही वसूला करता थे. सूद कीतनी ली जाय वह नवार्ड द्वारा तय किया जाता था. लेकिन वर्तमान समय में पैक्स भी समृद्ध नहीं रह गया है. — धान मूल्य के लिए नहीं भटकते किसान — पैक्स को धान देने वाले किसानों को मूल्य के लिए काफी इंतजार करना पड़ता है. जैसा की 2014 में जो किसान पैक्स के पास धान की बिक्री किये थे उसमें से अधिकांश किसानों को अभी तक धान का मूल्य नहीं मिल पाया है. चूंकि यहां के किसानों को धान का मूल्य बैंक खाता में बेगुसराय जिले के सेंट्रल कॉपरेटिव बैंक बिहट से राशि निर्गत करने का प्रावधान है. अधिक दूरी रहने के कारण किसान बैंक पदाधिकारी से संपर्क नहीं कर पाते है. — कर्मचारियों का नहीं किया गया समायोजन — उक्त बैंक को बंद कर दिये जाने के बाद कार्यरत कर्मियों का सरकार द्वारा समायोजन नहीं किया गया. जिससे ऐसे परिवारों के समक्ष अर्थ उपार्जन की समस्या आ चुकी है. न तो बच्चों को उचित शिक्षा दिला पा रहे है और न तो भरपेट पोष्टिक आहार भी दे पा रहे है. यहां तक कि बेटियों की शादी में जमीन बेच कर ऐसे परिवार भूमिहीन होते चले जा रहे है. जबकि माननीय उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को आदेश दिया था कि बैंक में कार्यरत कर्मियों की सेवा समायोजन की दिशा में सार्थक कदम उठाया जाय. बावजूद इसके भी समायोजन अब तक नहीं किया गया है. ऐसी बात नहीं की सिर्फ बिहार में ही इस बैंक की कुछ शाखाएं बंद की गयी. बल्कि झारखंड प्रदेश में भी उक्त बैंक की शाखाएं बंद की गयी. लेकिन उसमें कार्यरत कर्मियों का समायोजन झारखंड सरकार द्वारा कर दिया गया है. सहरसा कॉपरेटिव सेंट्रल बैंक में पद स्थापित रहे शाखा प्रबंधक दिनेश कुमार सिंह ने कहा कई ऐसे कर्मी हैं जिनकी मौत भी हो चुकी है. बिहारीगंज शाखा में पदस्थापित शाखा प्रबंधक राजेश कुमार सिंह की मौत हो चुकी है. लेकिन सरकार उस परिवार को मदद तक नहीं कर पायी. इस तरह मधेपुरा, सहरसा, सुपौल सेंट्रल कॉपरेटिव बैंक के बंद किये जाने से किसानों को महाजनों कर्ज लेकर खेती करना मजबूरी बन गयी है. वहीं दूसरी ओर कार्यरत कर्मियों का समायोजन नहीं किये जाने से ऐसे परिवार आर्थिक तंगी के दौड़ से गुजरने को अभिशप्त है. बावजूद इसके भी सांसद, विधायक बैंक को पूर्णजीवित करने के लिए सरकार के सामने आवाज उठाना उचित नहीं समझ रहे हैं.अगर सोचते तो उक्त बैंक कब का पुर्णजीवित हो गया होता.

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