कोलोरेक्टल कैंसर बड़ी आंत की गांठ जागरूकता माह विशेष

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शारीरिक निष्क्रियता, आंतों की सूजन संबंधी बीमारियां अल्सरेटिव कोलाइटिस और क्रोहन रोग व पारिवारिक इतिहास शामिल हैं.

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एक से 30 मार्च तक जिले में विशेष जागरूकता अभियान

सदर अस्पताल में तैनात चिकित्सक ने दी विस्तृत जानकारी

लखीसराय. हर वर्ष एक से 30 मार्च तक कोलोरेक्टल कैंसर जागरूकता माह मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को बड़ी आंत कोलन और मलाशय रेक्टम से जुड़े कैंसर के प्रति सचेत करना व समय पर जांच और इलाज के लिए प्रेरित करना है. सदर अस्पताल के चिकित्सा पदाधिकारी डॉ निशांत निराला ने बताया कि कोलोरेक्टल कैंसर तब होता है, जब बड़ी आंत की भीतरी परत में मौजूद कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं. अधिकांश मामलों में यह बीमारी छोटे पॉलिप्स कोशिकाओं के असामान्य समूह से शुरू होती है. समय के साथ कुछ पॉलिप्स कैंसर में बदल सकते हैं और आंत की दीवार, आसपास के लसीका ग्रंथियों लिंफ नोड्स व शरीर के अन्य हिस्सों में फैल सकते हैं। पॉलिप्स मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं एडिनोमेटस पॉलिप एडिनोमा, जो कैंसर में बदल सकते हैं, व हाइपरप्लास्टिक और सूजन संबंधी पॉलिप्स, जो सामान्यतः कैंसर में परिवर्तित नहीं होते. पॉलिप्स के आकार, प्रकार और संख्या के आधार पर कैंसर बनने की संभावना तय होती है. विश्व स्तर पर कोलोरेक्टल कैंसर तीसरा सबसे आम कैंसर है. हर वर्ष लगभग 18 लाख नए मामले सामने आते हैं और करीब 8.62 लाख लोगों की मृत्यु इसका कारण बनती है. जीवनकाल में प्रत्येक 20 में से एक व्यक्ति को यह कैंसर होने का जोखिम रहता है. जोखिम कारक में बढ़ती उम्र, अधिक वसा और लाल मांस वाला आहार, कम फाइबर का सेवन, धूम्रपान, शराब, मोटापा, मधुमेह, शारीरिक निष्क्रियता, आंतों की सूजन संबंधी बीमारियां अल्सरेटिव कोलाइटिस और क्रोहन रोग व पारिवारिक इतिहास शामिल हैं. उन्होंने बताया कि इसके प्रमुख लक्षणों में मल त्याग की आदतों में बदलाव, लगातार दस्त या कब्ज, पेट दर्द, कमजोरी, वजन कम होना, खून की कमी एनीमिया और मल में खून आना शामिल हैं. जांच के लिए मल में छिपे खून की जांच एफओबीटी, कोलोनोस्कोपी और बायोप्सी प्रमुख विधि हैं। कैंसर का प्रसार रक्त, लसीका तंत्र या आसपास के ऊतकों के माध्यम से हो सकता है। इसका इलाज कैंसर के चरण और स्थान पर निर्भर करता है। प्रारंभिक अवस्था में शल्य चिकित्सा मुख्य इलाज है, जिसमें प्रभावित हिस्से को लसीका ग्रंथियों सहित हटाया जाता है। इसके अलावा कीमोथेरेपी औषधीय उपचार, लक्षित चिकित्सा, प्रतिरक्षा चिकित्सा और विकिरण चिकित्सा का उपयोग किया जाता है. 45 वर्ष से अधिक आयु के लोग व जोखिम समूह में आने वालों को नियमित जांच करानी चाहिए. समय पर पहचान और उपचार से कोलोरेक्टल कैंसर का सफल इलाज संभव है. उन्होंने बताया कि सदर अस्पताल सहित जिले के विभिन्न सरकारी संस्थान में नियमित रूप से कैंसर स्क्रीनिंग किया जा रहा है.

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Rajeev Murarai Sinha Sinha

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By Rajeev Murarai Sinha Sinha

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