भगवान महावीर जयंती के अवसर पर आज क्षत्रिय कुंड लछुआड़ में होगा भव्य कार्यक्रम
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 17 Apr 2019 7:26 AM
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सिकंदरा : ऋषभदेव से प्रारंभ हुई जैन तीर्थंकर परंपरा के 24वें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जन्म लगभग 26 सौ साल पहले क्षत्रियकुंड में हुआ था. महावीर को वर्धमान, वीर, अतिवीर और ‘सन्मति’ भी कहा गया है. भगवान महावीर स्वामी ने ज्ञान की प्राप्ति के लिये 30 वर्ष की उम्र में गृह त्याग […]
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सिकंदरा : ऋषभदेव से प्रारंभ हुई जैन तीर्थंकर परंपरा के 24वें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जन्म लगभग 26 सौ साल पहले क्षत्रियकुंड में हुआ था. महावीर को वर्धमान, वीर, अतिवीर और ‘सन्मति’ भी कहा गया है. भगवान महावीर स्वामी ने ज्ञान की प्राप्ति के लिये 30 वर्ष की उम्र में गृह त्याग कर दुनिया को पंचशील का पाठ पढ़ाया.
तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को सबसे उच्चतम नैतिक गुण बताया. उन्होंने दुनिया को अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य का संदेश दिया. श्रमण महावीर स्वामी ने अपने उपदेशों और प्रवचनों के माध्यम से दुनिया को सही राह दिखाई और मार्गदर्शन किया.
प्रारंभिक जीवन. महावीर स्वामी का जन्म क्षत्रियकुंड के इच्छवाकु वंशीय राजा सिद्धार्थ व रानी त्रिशला के घर 599 ईसा पूर्व हुआ था. इनका जीवन काल 599 ईसा पूर्व से 527 ई. ईसा पूर्व तक माना जाता है.
बचपन में महावीर का नाम ‘वर्धमान’ था. लेकिन बाल्यकाल से ही वे साहसी, तेजस्वी, ज्ञान पिपासु और अत्यंत बलशाली होने के कारण ‘महावीर’ कहलाये. अपनी इंद्रियों पर विजय पा लेने के कारण भगवान महावीर को जितेंद्र भी कहा जाता है.
गृह त्याग और कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति.कलिंग वंश की राजकुमारी यशोदा से महावीर का विवाह हुआ. जिससे उन्हें प्रियदर्शिनी नाम की पुत्री भी हुई. परंतु गृहस्थ जीवन से मन विरक्त हो जाने के बाद 30 वर्ष की उम्र में अपने बड़े भाई राजा नंदिवर्धन की आज्ञा लेकर सांसारिक मोह माया का त्याग करते हुए इन्होंने घर-बार छोड़ दिया और तपस्या करके ‘कैवल्य ज्ञान’ प्राप्त किया.
वो क्षत्रियकुंड से बाहर निकल कर अपने कपड़ों का भी त्याग कर दिया और कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति के लिये निकल पड़े. गृह त्याग के उपरांत भगवान महावीर स्वामी ज्ञान की प्राप्ति के कठिन साधना शुरू की. 12 वर्ष की कठिन तपस्या व साधना के बाद प्राचीन जृम्भिक ग्राम में ऋजुवालीक नदी के तट पर शाल वृक्ष के नीचे कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई.
इसके बाद उन्हें ‘केवलिन’ नाम से भी जाना गया तथा उनके उपदेश चारों और फैलने लगे. बड़े-बड़े राजा महावीर स्वामी के अनुयायी बने उनमें से बिम्बिसार भी एक थे. 30 वर्ष तक महावीर स्वामी ने त्याग, प्रेम और अहिंसा का संदेश फैलाया और बाद में वे जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर बनें और विश्व के श्रेष्ठ महात्माओं में शुमार हुए.
पंचशील सिद्धांत व शिक्षाएं
सत्य – सत्य सबसे बलवान है और हर इंसान को किसी भी परिस्थिति में सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए. सदा सत्य बोलो.
अहिंसा – दूसरों के प्रति हिंसा की भावना नहीं रखनी चाहिए. जितना प्रेम हम खुद से करते हैं उतना ही प्रेम दूसरों से भी करें. मन, वचन और कर्म से अहिंसा धर्म का पालन करें.
अस्तेय – दूसरों की चीज़ों को चुराना और दूसरों की चीज़ों की इच्छा करना महापाप है. जो मिला है उसमें संतुष्ट रहें.
अपरिग्रह – ये दुनियां नश्वर है. लोभ और मोह ही आपके दुखों का कारण है. सच्चे इंसान को कभी सांसारिक वस्तुओं का मोह नहीं करना चाहिये.
क्षमा- जगत के सभी जीवों के प्रति मेरा मैत्रीभाव है. मेरा किसी से वैर नहीं है. मैं सच्चे हृदय से धर्म में स्थिर हुआ हूं. सब जीवों से मैं सारे अपराधों की क्षमा मांगता हूं. सब जीवों ने मेरे प्रति जो अपराध किये हैं, उन्हें मैं क्षमा करता हूं.
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