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शिक्षक दिवस का बदल रहा स्वरूप, दीख रही भौतिकवाद की धमक

Updated at : 03 Sep 2025 7:37 PM (IST)
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शिक्षक दिवस का बदल रहा स्वरूप, दीख रही भौतिकवाद की धमक

स्कूल में छात्रों की एक अलग ही दुनिया होती है. कोई अपने दोस्तों के लिए स्कूल जाता है तो कोई अपने पेरेंट्स के डर से स्कूल पहुंचता है, पर किसी छात्र के लिए शिक्षा ही महत्वपूर्ण है लेकिन स्कूल की इस दुनिया में केवल छात्र का ही रोल नहीं है.

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शिक्षकों को शिक्षा के प्रति होना होगा समर्पित

ठाकुरगंज. स्कूल में छात्रों की एक अलग ही दुनिया होती है. कोई अपने दोस्तों के लिए स्कूल जाता है तो कोई अपने पेरेंट्स के डर से स्कूल पहुंचता है, पर किसी छात्र के लिए शिक्षा ही महत्वपूर्ण है लेकिन स्कूल की इस दुनिया में केवल छात्र का ही रोल नहीं है. शिक्षक उस दुनिया का एक ऐसा किरदार है जो शिक्षा से छात्रों के जीवन में नई रोशनी लेकर आता हैं. शुक्रवार को देश में टीचर्स डे मनाया जायेगा. यह शिक्षक दिवस डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन के दिन मनाया जाता है. डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक राजनीतिज्ञ, बेहतरीन शिक्षक, विद्वान और प्रसिद्ध दार्शनिक थे. जब वे भारत के राष्ट्रपति बने तब उन्होंने अपने जन्मदिन को सारे शिक्षकों को समर्पित करते हुए शिक्षक दिवस मनाये जाने का प्रस्ताव रखा. 1962 से 5 सितंबर से भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. परंतु देखा जाय तो छात्रों के लिए रोज टीचर्स डे होता है.

बदल गये शिक्षक दिवस के मायने : अर्जुन पासवान

फोटो 3 अर्जुन पासवान

पहले शिक्षक दिवस सादगी से मनाया जाता था लेकिन अब इस दिन महंगे उपहार और डीजे बजाने का चलन शुरू हो गया है. जो कि डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचार को घायल कर रहा है. आज के बच्चे आदर्शों का गला घोंटकर शिक्षक दिवस पर केक काट कर मनाने में विश्वास रखते है. समाज के सामने आदर्श शिक्षक दिवस मनाने की पहल शुरू करने की कोशिश होनी चाहिए. क्योंकि शिक्षक दिवस ना ही दिखावा है और ना ही बाजारूपन है. यह दिन एक शिष्य की ओर से गुरु के सम्मान में समर्पित है. इस दिन को सादगी व सम्मान के साथ मनाये.

शिक्षक दिवस के रूप में होता है दिखावा : चन्द्रशेखर

फोटो 4 चन्द्रशेखर

शिक्षक दिवस अब आधुनिकता और दिखावा से भर गया है. गुरु और शिष्य का रिश्ता पिता और संतान की तरह है . दोनों एक दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़े होते थे. शिक्षक अपने शिष्यों के लिए बहुत से त्याग करते थे लेकिन वर्तमान समय में गुरु और शिष्य का रिश्ता बदल गया है. एक शिक्षक अपनी मार्ग से भटक गए हैं. अब शिक्षकों को भी पूर्व के आदर्श को अपनाना तथा शिक्षा के प्रति उन्हें समर्पित होना होगा, तभी उनका वास्तविक सम्मान पुन: स्थापित होगा. क्योंकि एक शिष्य को सफल बनाने में गुरु की भूमिका बहुत अहम होती है. जो दिखावा शिक्षक दिवस में शुरू हुआ है अब समय आ गया है इसे भी बंद होना चाहिए.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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AWADHESH KUMAR

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