31 साल से अधूरा ठाकुरगंज में पुस्तकालय का सपना, भवन बनकर तैयार लेकिन आज तक नहीं खुला

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बंद पड़ा पुस्तकालय भवन

ठाकुरगंज का सार्वजनिक पुस्तकालय 31 वर्षों से अधूरा पड़ा है. वर्ष 1991 में दान की गई जमीन पर सरकारी राशि से भवन निर्माण के बाद भी यह आम लोगों के लिए नहीं खुल सका है. हजारों विद्यार्थी और पुस्तक प्रेमी इस सुविधा से वंचित हैं.

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ठाकुरगंज से बच्छराज नखत की रिपोर्ट

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ठाकुरगंज में सार्वजनिक पुस्तकालय का सपना पिछले 31 वर्षों से अधूरा पड़ा है. जिस पुस्तकालय के लिए वर्ष 1991 में जमीन दान की गई और बाद में सरकारी राशि से भवन का निर्माण भी पूरा हो गया, वह आज तक आम लोगों के लिए नहीं खुल सका. भवन तैयार होने के कई वर्ष बाद भी उसका हस्तांतरण पुस्तकालय समिति को नहीं किया गया है. इससे हजारों विद्यार्थियों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं और पुस्तक प्रेमियों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है.

कभी शहर की शैक्षणिक पहचान था सार्वजनिक पुस्तकालय

स्थानीय शिक्षाविद प्रो. दिलीप यादव बताते हैं कि ठाकुरगंज का सार्वजनिक पुस्तकालय पहले आदर्श मध्य विद्यालय परिसर में संचालित होता था. विद्यालय में असुविधा होने पर इसे रानी सती मंदिर परिसर में स्थानांतरित किया गया, लेकिन वहां भी इसका संचालन लंबे समय तक नहीं चल सका. इसके बाद शहरवासियों ने स्थायी भवन बनाने की पहल शुरू की.

वर्ष 1991 में दान हुई थी जमीन

सार्वजनिक पुस्तकालय के स्थायी भवन के लिए समाजसेवी स्वर्गीय सुकुमार लाहिड़ी ने वर्ष 1991 में वार्ड संख्या-5 में लगभग दो डिसमिल जमीन दान की थी. लोगों को उम्मीद थी कि जल्द ही शहर को अपना पुस्तकालय मिल जाएगा, लेकिन तीन दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी यह सपना पूरा नहीं हो सका.

विधान परिषद निधि से बना भवन, फिर भी नहीं शुरू हुई सेवा

लंबे प्रयासों के बाद स्नातकोत्तर विधान परिषद सदस्य डॉ. एन. के. यादव ने अपनी निधि से पुस्तकालय भवन निर्माण के लिए राशि उपलब्ध कराई. भवन का निर्माण पूरा हो चुका है और बने हुए भी कई वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज तक इसका हस्तांतरण पुस्तकालय समिति को नहीं किया गया. नतीजतन लाखों रुपये की लागत से बना भवन उपयोग के बजाय बंद पड़ा है.

दानदाता परिवार ने प्रशासन से लगाई गुहार

भवन का हस्तांतरण नहीं होने से नाराज दानदाता परिवार ने जिलाधिकारी और जिला योजना पदाधिकारी को लिखित आवेदन देकर हस्तक्षेप की मांग की थी. शिकायत में कहा गया कि भवन तैयार होने के बावजूद पुस्तकालय का संचालन शुरू नहीं कराया गया है. हालांकि कई महीने बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो सकी.

विद्यार्थियों को सबसे अधिक हो रही परेशानी

सार्वजनिक पुस्तकालय नहीं होने से ठाकुरगंज और आसपास के क्षेत्रों के हजारों विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए निजी पुस्तकालयों, कोचिंग संस्थानों या दूसरे शहरों पर निर्भर रहना पड़ता है. आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए यह स्थिति अधिक कठिन साबित हो रही है.

शिक्षाविद बोले, पुस्तकालय समाज की बौद्धिक धरोहर

शिक्षाविद प्रदीप दत्ता का कहना है कि डिजिटल युग में भी पुस्तकालयों का महत्व कम नहीं हुआ है. पुस्तकालय केवल किताबों का संग्रह नहीं, बल्कि समाज की बौद्धिक चेतना और अध्ययन संस्कृति का केंद्र होता है. नई पीढ़ी को पुस्तकों से जोड़ने के लिए सार्वजनिक पुस्तकालयों का सक्रिय होना जरूरी है.

प्रमुख बातें

  1. वर्ष 1991 में पुस्तकालय के लिए जमीन दान की गई थी.
  2. सरकारी राशि से भवन का निर्माण कई वर्ष पहले पूरा हो चुका है.
  3. आज तक भवन का हस्तांतरण पुस्तकालय समिति को नहीं किया गया.
  4. हजारों विद्यार्थी और पुस्तक प्रेमी सार्वजनिक पुस्तकालय की सुविधा से वंचित हैं.
  5. दानदाता परिवार और स्थानीय लोगों ने पुस्तकालय जल्द शुरू कराने की मांग की है.

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