पूर्व एसडीपीओ गौतम ने 32 में से 25 साल पूर्णिया प्रमंडल में दी सेवा

Updated at : 05 Apr 2026 10:24 PM (IST)
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पूर्व एसडीपीओ गौतम ने 32 में से 25 साल पूर्णिया प्रमंडल में दी सेवा

25 साल पूर्णिया प्रमंडल में दी सेवा

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पूर्व एसडीपीओ गौतम कुमार की पोस्टिंग पर उठे सवाल

बेनामी संपत्ति के बाद अब रडार पर पुलिस मुख्यालय की भूमिका

एक ही क्षेत्र में लंबे समय तक बने रहने से नेटवर्क हुआ मजबूत

किशनगंज. किशनगंज के पूर्व एसडीपीओ गौतम कुमार की बेनामी संपत्ति मामले की जांच के बीच अब उनकी पोस्टिंग को लेकर भी बड़े सवाल खड़े हो गये हैं. बताया जा रहा है कि अपने करीब 32 साल के पुलिस सेवा काल में उन्होंने लगभग 25 साल पूर्णिया कमिश्नरी के जिलों किशनगंज, पूर्णिया, अररिया व कटिहार में ही नौकरी की.

अब सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसा कैसे संभव हुआ कि एक ही प्रमंडल में किसी पुलिस अधिकारी की इतनी लंबी पोस्टिंग होती रही व पुलिस मुख्यालय ने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया. जानकारी के अनुसार, गौतम कुमार ने 1994 में पुलिस सेवा जॉइन की थी व 1996 में उनकी पहली पोस्टिंग दारोगा के रूप में किशनगंज में हुई थी.

नियमों को ताक पर रखकर होती रही पोस्टिंग

पुलिस विभाग में सामान्यतः यह नियम है कि किसी भी अधिकारी को लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में नहीं रखा जाता ताकि स्थानीय नेटवर्क व भ्रष्टाचार की संभावना कम हो. लेकिन गौतम कुमार के मामले में यह नियम लागू होता नहीं दिखा. वे कभी किशनगंज, कभी अररिया, कभी पूर्णिया तो कभी कटिहार में पोस्टेड रहे. बीच-बीच में तबादला हुआ भी तो उसी प्रमंडल के दूसरे जिले में कर दिया गया.

अवैध नेटवर्क व अकूत संपत्ति के आरोप

आरोप है कि लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में रहने के कारण उन्होंने स्थानीय कारोबारियों, माफियाओं व तस्करों के साथ गहरा नेटवर्क बना लिया. विशेषकर परिवहन विभाग में मोबाइल दारोगा के रूप में उन्होंने सबसे ज्यादा संपत्ति इकट्ठा की. इसके अलावा सीमांचल में अवैध बालू खनन, शराब, लकड़ी, पशु व कोयला तस्करी से जुड़े लोगों से संबंधों के जरिए भारी संपत्ति अर्जित करने की बात सामने आ रही है.

जांच के घेरे में ट्रांसफर-पोस्टिंग सिस्टम

आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) द्वारा संपत्ति की जांच शुरू होने के बाद अब पुलिस विभाग के अंदर भी चर्चा तेज हो गयी है. सवाल यह है कि बिना उच्च स्तर की मिलीभगत के इतने वर्षों तक एक ही प्रमंडल में पोस्टिंग कैसे संभव हुई. अब मांग उठ रही है कि सिर्फ अवैध संपत्ति ही नहीं, बल्कि पोस्टिंग नीति व पुलिस मुख्यालय की कार्यप्रणाली की भी गहन जांच होनी चाहिए. आने वाले समय में यह मामला और बड़ा रूप ले सकता है.

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