इस दीपावली जलाइए मिट्टी के दीये, ताकि उनके घर भी मने खुशियां

Published by :AWADHESH KUMAR
Published at :18 Oct 2025 8:02 PM (IST)
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इस दीपावली जलाइए मिट्टी के दीये, ताकि उनके घर भी मने खुशियां

इस दीपावली जलाइए मिट्टी के दीये, ताकि उनके घर भी मने खुशियां

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-मिट्टी के दीये जलाना हमारी परंपरा, इस संस्कृति को बनाए रखना हमारा कर्तव्य

-बिक्री में गिरावट के कारण इस धंधे से कुम्हारों का हो रहा है मोहभंग-आधुनिकता के चकाचौंध में गुम हो रहे मिट्टी के दीये

किशनगंज

वो तो कोशिश कर रहें हैं कि हर घर दीपक जले. अब जिम्मेवारी हमारी है दीपक उनके घर भी जले. जी हां उम्मीद के चाक ने एक बार से रफ्तार पकड़ी है. दीयों और मिट्टी के बर्तन के धंधे से जुड़े कुम्हार समुदाय विशेष तौर पर दीपावली के त्योहार का वर्ष भर इंतजार करते हैं. दीपावली से लेकर छठ के बीच मिट्टी से बने दीये, कोशी, मिट्टी के हाथी, डिबरी आदि की कभी जोरदार मांग होती थी. प्राचीन काल से ही मिट्टी के बर्तनों का प्रचलन चला आ रहा है. आधुनिकता में मिट्टी के बर्तनों की मांग को कम कर दिया है. जिससे कुम्हारी कला को झटका लगा है. दीपावली के पावन अवसर पर मिट्टी के दीये का स्थान चाइनिज लट्टूओं ने ले रखा है. हालांकि पूजा अनुष्ठान के समय मिट्टी के दीपक घी या तेल से आज भी दीया जलाने की परंपरा जारी है. मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने वाले दीपावली के एक दो दिन पूर्व बच्चों के लिए मिट्टी के खिलौने, हाथी, घोड़ा, जाता, घंटी, तराजु के साथ कलश, दीया आदि खरीदने के लिए ग्रामीणों की भीड़ जुटती थी. लेकिन बदलते परिवेश में केवल परंपराओं के निर्वहन के लिए इसकी मांग सीमित होकर रह गई है. बढ़ती मंहगाई एवं बर्तनों की मांग में कमी देखते हुए कुम्हार अपना पुस्तैनी प्रथा छोड़कर अन्य व्यवसाय अपनाने को मजबूर हैं.

मिट्टी के बने सामान की बनावट, रंगाई व पकाने में किसी भी प्रकार का केमिकल प्रयोग नहीं किया जाता है. दीये पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.

गांव में सदियों से पारंपरिक कला उद्योग से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में जहां पूरा सहयोग मिलता रहा,वहीं गांव में रोजगार के अवसर भी खूब रहे.इनमें से ग्रामीण कुम्हारी कला भी एक रही है,जो समाज के एक बड़े वर्ग कुम्हार जाति के लिए रोजी-रोटी का बड़ा सहारा रहा.

कई बुजुर्गों का कहना है कि अगर अधिक से अधिक मिटटी के दिये जलाया जाता है तो इससे कुम्हार के घर तो खुशिहाली आना तय है. ऐसा कर हम दीपावली के असली परंपरा को निभा सकते हैं. चूकि सदियों से मिट्टी से बने दिये से ही अपने घर आंगन को गरीब से लेकर अमीर सजाते है. मिट्टी के दिये से सजे घर-आंगन ही असली दीपावली का ऐहसास कराता है. यह हमे अपने परंपरा और पूर्वजों को याद दिलाता है. हाल के कुछ वर्षों में देखा जाय तो मिट्टी के दिये जलने नाममात्र को हो गया है. पहले शहर में कुछ लोग ऐसा करते थे. एक-दूसरे की नकल करते हुए आज घर-घर में यह चलन हो गया . हाल के दिनों में यह चलन गांव में भी पहुंच गया. बुजुर्ग कहते है कि हाल के दिनों में लोग चाइनिज लट्टूओं को अपना रहे है. युवा को परंपरा कि ओर लौटना चाहिए और युवाओं को अपने घर-आंगन में मिट्टी के दिये की रोशनी की जगमगाहट लानी चाहिए.

दीयों का धार्मिक महत्व

हिंदू परंपरा में मान्यता है कि मिट्टी का दीपक जलाने से घर में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है. मिट्टी को मंगल ग्रह का प्रतीक माना जाता है. मंगल साहस, पराक्रम में वृद्धि करता है और तेल को शनि का प्रतीक माना जाता है. शनि को न्याय और भाग्य का देवता कहा जाता है. मिट्टी का दीपक जलाने से मंगल और शनि की कृपा प्राप्त होती है. जो मन की शांति एक मिट्टी के दिये से मिलती हैं वह आज की रंग- बिरंगी रोशनी से कदापि नहीं मिल सकती.

दिवाली ऐसे समय में आती है जब वर्षा ऋतु समाप्त हो चुकी होती है तथा शरद ऋतु शुरू जो जाती है. ऐसे समय में वातारण में किट-पतंगे, मच्छर व अन्य जहरीले विषाणुओं की संख्या बढ़ जाती है. जो सभी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है. दीपावली में जब सरसों के तेल से मिट्टी के दिये जलाए जाते हैं तो इन सभी जीवाणुओं का नाश हो जाता है.

मिट्टी ही प्रकृति है तथा इसी मिट्टी के दिये जलाने से प्रकृति को कोई हानि नही है. यदि यह दिये टूट भी जाते हैं या इन्हें फेकना भी हो तो इसे नदी -नहर में बहा दिया जाता है जिससे प्रकृति को कोई नुकसान नही होता दूसरी ओर प्लास्टिक इत्यादि धातुओं से बनी लाइट्स या दिये पर्यावरण के लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं.

कहतें हैं कुम्हार

चाक पर मिट्टी की दीये बना रहे कुम्हार बताते हैं. कि दीपावली पर ही सही कुछ कमाई हो जाये. वरना इन मिट्टियों की कीमत कोई क्या देगा. वे बताते हैं कि हमारा पेशा है. बस दो वक्त का पेट भर जाता है. वर्ना इस पेशे में कुछ नहीं रखा है. पूर्वजों से सौगात में मिली हुनर है. बस इसे जिंदा रखे हुए है. दीपावली पर लोग अब भी मिट्टी के दीये जलाना पसंद करते है, इसलिए थोड़ी बहुत हमारी भी कमाई हो जाती है.

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