चुरली मैदान में सोहराय पर्व पर लगा मेला, बड़ी तादाद में पहुंच रहे आदिवासी समुदाय के लाग

Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 09 Jan 2025 8:51 PM

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आदिवासियों का सोहराय पर्व गुरुवार से शुरू हो गया है. बेसरबाटी पंचायत के चुरली मेला मैदान में चलने वाले इस पर्व का संबंध सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है.

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ठाकुरगंज. आदिवासियों का सोहराय पर्व गुरुवार से शुरू हो गया है. बेसरबाटी पंचायत के चुरली मेला मैदान में चलने वाले इस पर्व का संबंध सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है. आदिवासी समाज के इस महान पर्व को लेकर लोगों में काफी उत्साह देखा गया. गुरुवार को चुरली मैदान में आयोजित कार्यक्रम में विधान पार्षद प्रतिनिधि सह अधिवक्ता कौशल किशोर यादव, मुखिया अनुपमा ठाकुर, लोजपा नेता किशन बाबू पासवान, मुकेश हेंब्रम, सुबोध टूडू, सुनील सहनी, अनिल कुमार शाह, मोहम्मद जावेद, मोहम्मद चांद,सहित कमेटी के लोग मौजूद थे.

आदिवासी समाज की संस्कृति और सभ्यता

जनजातीय समाज में इस पर्व का बेहद खास महत्व है. आदिवासी समाज इस पर्व को उत्सव की तरह मनाता है. बताते चले आदिवासी समाज की संस्कृति और सभ्यता काफी रोचक है. शांत चित्त स्वभाव के लिए जाना जाने वाला आदिवासी समुदाय मूलतः प्रकृति पूजक है.

सोहराय पर्व जातीय समाज में मरांगबुरू का उच्च स्थान

आदिवासियों में सोहराय पर्व की उत्पत्ति की कथा भी काफी रोचक है. इसकी कथा सृष्टि की उत्पति से जुड़ी हुई है. आदिवासी समाज में प्रचलित कथा के अनुसार, जब मंचपुरी अर्थात् मृत्यु लोक में मानवों की उत्पत्ति होने लगी, तो बच्चों के लिए दूध की जरूरत महसूस होने लगी. उस काल खंड में पशुओं का सृजन स्वर्ग लोक में होता था. मानव जाति की इस मांग पर मरांगबुरु अर्थात आदिवासियों के सबसे प्रभावशाली देवता. यहां बताना यह जरूरी है कि शेष भारतीय समाज मरांगबुरू को शिव के रूप में देखता है,

इस दौरान मांझी परगना संथाल समाज के सचिव मुकेश हेम्ब्रम ने बताया की संथाल आदिवासी का साल भर में 12 पर्व होता है जिसमें सोहराय सबसे बड़ा पर्व है. इस पर्व को मनाने के पूर्व ग्राम प्रधान के निर्देश पर गुडित ग्रामीण की बैठक बुलाता है जहां पर्व की तिथि तय होती है. ततपश्चात गांव के सभी परिवार के लोग अपने अपने संगे संबंधियों को पर्व का निमंत्रण देते हैं. घरों की रंगाई पोताई करते हैं. साथ ही परिवार के मुखिया घर के सभी सदस्यों के लिए नये नये वस्त्र खरीदते हैं. सुबोध टुडू ने बताया कि यह पर्व धान कटनी के पश्चात अनाज का घर में आगमन के बाद मनाया जाता है.

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